सृष्टि की उत्पत्ति से पूर्व, द्वैत के अस्तित्व से रहित, नाम और रूप से परे, एकमात्र सत्यस्वरूप, अद्वितीय ब्रह्म ही विद्यमान था और वही ब्रह्म आज भी विद्यमान है।
वही ब्रह्म‘तत्’ पद(‘तत्त्वमसि’ महावाक्य में) द्वारा निरूपित किया गया है।
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