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अध्याय 1 — सांख्यसारार्थयोग

गणेशगीता
69 श्लोक • केवल अनुवाद
शुकदेवजी बोले - पूर्वकाल में महात्मा शौनक के पूछने पर सूतजी ने व्यासजी के मुख से श्रवण की हुई गीता का वर्णन किया था।
सूतजी बोले - हे भगवन्! आपने अष्टादश पुराणों के साररूप अमृत का मुझे पान कराया, परंतु अब उससे भी अधिक रसीले उत्तम अमृत का पान करने की मेरी इच्छा है।
जिस अमृत को पाकर मनुष्य ब्रहारूप हो जाते हैं, हे महाभाग! उस योगामृत का कृपाकर आप मुझसे वर्णन कीजिये।
व्यासजी बोले - हे सूतजी! योगमार्ग को प्रकाशित करने वाली गीता का अब तुमसे वर्णन करता हूँ, जिसको राजा वरेण्य के पूछने पर सम्पूर्ण विघ्नों के नाशक गणेशजी ने कहा था।
राजा वरेण्य बोले - हे विघ्नेश्वर! हे महाभुज! हे सर्व विद्याओं के पण्डित! हे सम्पूर्ण शास्त्र के तत्त्व को जानने वाले! आप मुझसे योगमार्ग का वर्णन कीजिये।
श्रीगजानन बोले - हे राजन्! मेरी कृपा से तुम्हारी बुद्धि निर्मल और स्थिर हो गयी है, सुनो, मैं योगामृत से परिपूर्ण गीता तुमसे कहता हूँ।
'योग' इस शब्द का ही अर्थ योग नहीं, लक्ष्मी की प्राप्ति होने का नाम योग नहीं, विषय-सुख की प्राप्ति होने का नाम योग नहीं और इन्द्रिय-सम्पन्न होने का नाम भी योग नहीं है।
हे राजन्! माता-पिता के समागम का नाम योग नहीं है। आठ प्रकार की सिद्धि और बन्धुपुत्रादि की प्राप्ति का नाम भी योग नहीं है।
अत्यन्त रूपवती स्त्री की प्राप्ति का नाम योग नहीं है, राज्य की प्राप्ति तथा हाथी-घोड़े की प्राप्ति का नाम भी योग नहीं है।
इन्द्रपद की प्राप्ति का नाम योग नहीं है, योग द्वारा प्रिय सिद्धि की इच्छा अथवा सत्यलोक की प्राप्ति को भी मैं योग नहीं मानता।
हे राजन्! शिव पद की प्राप्ति होना, वैष्णव पद की प्राप्ति होना, सूर्य-चन्द्र और कुबेर के पद की प्राप्ति होने का भी नाम योग नहीं है।
वायुस्वरूप, अग्निस्वरूप, देवस्वरूप, कालस्वरूप, वरुणस्वरूप, निर्ऋतिस्वरूप अथवा सम्पूर्ण पृथ्वी के आधिपत्य पाने का नाम भी योग नहीं है।
हे राजन्! योग अनेक प्रकार का है, परंतु (यथार्थ योग वही है) जिसको पाकर ज्ञानी लोग विषयों को जीतकर ब्रह्मचर्यपूर्वक संसार से विरक्त हो जाते हैं।
ज्ञानी लोग तीनों लोकों को वश में करके सम्पूर्ण जगत्को पवित्र करते हैं, उनका हृदय दया से पूर्ण होता है और वे सत्पात्रों को ज्ञान भी प्रदान करते हैं।
वे जीवन्मुक्त होकर परमानन्दरूपी सरोवर में मग्न रहते हैं और नेत्र मूंदकर अपने हृदय में स्थित परब्रह्म का दर्शन करते रहते हैं।
योग से वशीभूत किये अपने चित्त में परब्रह्म का ध्यान करते हुए वे सम्पूर्ण प्राणियों को अपने समान समझते हैं।
कहीं किसी प्रकार से स्वयं को छिपाये हुए, कहीं किसी से प्रताडित, कहीं किसी से बुलाये गये और कहीं किसी से आश्रित होकर
दयापूर्ण हृदय से क्रोध को जीते हुए जितेन्द्रिय वे योगी लोकों पर अनुग्रह करने के लिये ही पृथ्वी पर विचरते हैं।
प्रिय राजन्! वे केवल देहमात्र को ही धारण करने वाले, मिट्टी-पत्थर तथा स्वर्ण में समान दृष्टि रखने वाले इस प्रकार के महाभाग पुरुष जिस योग के द्वारा दृष्टिगोचर हो जाते हैं,
उस श्रेष्ठ योग को मैं तुमसे अब कहता हूँ; सुनो, जिसके श्रवण करने से प्राणी पापों से और भवसागर से मुक्त हो जाता है।
हे राजन्! शिव, विष्णु, शक्ति, सूर्य और मुझमें जो अभेदबुद्धिरूप योग है, उसी को मैं यथार्थ योग मानता हूँ।
मैं ही अपनी लीला से अनेक वेष धारण करता हुआ इस जगत्‌ की उत्पत्ति, पालन और संहार करता हूँ।
हे प्रिय! मैं ही महाविष्णु, मैं ही सदाशिव, मैं ही महाशक्ति और मैं ही सूर्य हूँ।
एकमात्र मैं ही मनुष्यों का स्वामी हूँ, (विष्णु, शिव, शक्ति, सूर्य तथा गणेश) इन पाँच प्रकार से मैं पूर्वकाल में उत्पन्न हुआ हूँ, मैं जगत्के कारण का भी कारण हूँ, मुझको अज्ञानी लोग नहीं जानते।
अग्नि, जल, पृथ्वी, आकाश, वायु, ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र, लोकपाल और दसों दिशाएँ,
आठ वसु, मुनि, गौ, मनु, पशु, नदी, समुद्र, यक्ष, वृक्ष, पक्षियों के समूह,
इक्कीस स्वर्ग, नाग, सात वन, मनुष्य, पर्वत, साध्य, सिद्ध, राक्षस इत्यादि सब मुझसे ही उत्पन्न हुए हैं।
मैं ही सबका साक्षी, सम्पूर्ण जगत्‌ का नेत्र, सभी कर्मों से अलिप्त, निर्विकार, अप्रमेय, अव्यक्त, सम्पूर्ण जगत्में व्याप्त और अविनाशी हूँ।
हे राजन्! मैं ही अव्यय आनन्दस्वरूप परब्रह्म हूँ, मेरी माया सम्पूर्ण जगत्‌ को तथा श्रेष्ठ पुरुषों को भी मोहित करती है।
जो माया सदा कामक्रोधादि छः विकारों में इन प्राणियों को लगा देती है, योग से जब शनैः शनैः अनेक जन्म के माया के कपाट दूर हो जाते हैं
तब यह प्राणी विषयों से जागकर और उनसे विरक्त हो परब्रह्म को जानते हैं, जो ब्रह्म शस्त्र समूहों से छेदन नहीं हो सक्ता अग्नि से दुग्ध नहीं हो सक्ता।
जल से गल नहीं सकता पवन से सूख नहीं सकता, हे राजन्! जो इस शरीर के नष्ट होने पर भी नष्ट नहीं होता वही ब्रह्म है।
वेदत्रयी में श्रद्धा रखने वाले, केवल कर्म करने वाले मूढ लोग श्रुति की कही हुई फल प्रतिपादक बाणी की ही प्रशंसा करते हैं दूसरी बात को नहीं मानने हैं।
इसी कारण वे जन्म और मृत्यु के फल देने वाले कर्मों को सदा करते रहते हैं वे स्वर्ग के ऐश्वयों में ही लगे रहते हैं, उन भोगबुद्धि वालों की चेतना नष्ट हो जाती है।
हे राजन्! वे आप ही अपने निमित्त बंधन बनाते हैं, मूढ और कर्मपरायण मनुष्य संसार चक्र में पडते हैं।
जिसको लिये जो कर्म विधान किया है, वह कर्म मुझे अर्पण कर देना चाहिये, तब इन प्राणियों के कर्मरूप बीजों के महान अंकुर नष्ट हो सकते हैं।
चित्त की शुद्धि होने से ही विज्ञान की प्राप्ति होती है, विज्ञान के द्वारा ही ऋषियों ने परब्रह्म को जाना है।
हे राजन्! इस कारण जो भी कर्म करे, वह बुद्धियुक्त होकर करे। किसी को स्वकर्म और स्वधर्म का त्याग नहीं करना चाहिये।
यदि कोई कर्म का त्याग करेगा तो उससे उसे सिद्धि की प्राप्ति नहीं होगी। ज्ञान में प्रथम अधिकार भी कर्म से ही प्राप्त होता है।
कर्म से शुद्ध हृदय होकर (साधक) अभेद बुद्धि को प्राप्त होता है, उसी का नाम योग है, जिससे प्राणी अमर हो जाता है।
हे राजन्! मैं दूसरा उत्तम योग कहता हूँ, तुम उसे सुनो। पशु, मित्र, पुत्र, शत्रु, बन्धु तथा प्रियजन में
समान दृष्टि करनी चाहिये, बाहर-भीतर एक-सी दृष्टि रखते हुए, सुख-दुःख, क्रोध, हर्ष, भय - इन में समान रहना चाहिये।
रोग की प्राप्ति हो चाहे भोग की प्राप्ति हो, जय हो या विजय हो, लक्ष्मी की प्राप्ति हो या अप्राप्ति हो, हानि-लाभ, जन्म-मरण - इन सब में मन को समान रखना उचित है।
सम्पूर्ण वस्तुओं में समान भाव से बाहर भीतर मुझे स्थित जानना, सूर्य, चन्द्रमा, जल, अग्नि, शिव, शक्ति,
वायु, ब्राह्मण, सरोवर, पापहारी महानदी, तीर्थ, क्षेत्र, विष्णु, सम्पूर्ण देवता, यक्ष,
उरग, गन्धर्व, मनुष्य और पक्षी - इन सब में जो मुझे सदा समान दृष्टि से देखता है, वही योग को जानने वाला कहलाता है।
हे राजन्! जो ज्ञान द्वारा इन्द्रियों को विषयों से हटाकर सर्वत्र समान बुद्धि रखता है, वही मेरी दृष्टि में योगी है।
अपने धर्म में आसक्त चित्त वाले प्राणी की दैव योग से जो आत्मा और अनात्मा के विचार की बुद्धि उत्पन्न होती है, उस बुद्धि के योग का ही नाम योग है।
उसी बुद्धि के न होने से यह प्राणी धर्म-अधर्म का त्याग कर देता है, इस कारण योग में बुद्धि लगाना उचित है, कर्तव्य कर्मों में कुशलता ही योग है।
जितेन्द्रिय और बुद्धिमान् व्यक्ति धर्म और अधर्म के फल का त्याग करके जन्म-बन्धन से मुक्त होकर अनामय परमपद को प्राप्त होता है।
जब इस प्राणी की बुद्धि अविद्या के अन्धकार से - अविद्या से रहित होगी, तब क्रम से इस प्राणी का सकाम वेदवाक्यादिकों में वैराग्य हो जाता है।
जब तीनों वेदों में प्रतिपादित किये गये सकाम कर्म से यह बुद्धि पूर्णतः और परमात्मा में लगकर निश्चल हो जाती है, तब इस प्राणी को योग की प्राप्ति होती है।
हे प्रिय! जब यह बुद्धिमान् व्यक्ति मन की सम्पूर्ण इच्छाओं का त्याग कर दे और अपने आत्मा में आप ही से सन्तुष्ट हो जाय, तब यह स्थिर बुद्धि कहलाता है।
किसी प्रकार के भी संसारी सुखों में तृष्णा न रखने वाला, दुःख में अनुद्विग्न, भय, क्रोध और राग से रहित व्यक्ति ही स्थिरबुद्धि कहा गया है।
जिस प्रकार से कछुआ सब ओर से अपने अंगों को सिकोड़ लेता है, इसी प्रकार से योगी को उचित है कि वह विषयों से इन्द्रियों को समेट ले।
भोजन त्यागने वाले साधक के विषय तो नष्ट हो जाते हैं, परंतु उनका अनुभव बना रहता है। ब्रह्म की प्राप्ति होने से वह राग भी नष्ट हो जाता है।
हे राजन्! इन्द्रियगण मोक्ष के लिये प्रयत्न करने वाले, विद्वान् पुरुष का भी मन बलात् हर लेती हैं। इस कारण बुद्धिमान् पुरुष को इन्द्रियों को वश में करने का यत्न करना चाहिये।
इन्द्रियों को वश में करके योगी को सदा मेरे परायण होना चाहिये। जिसकी इन्द्रियाँ वश में हो गयी हैं, उसी को स्थितप्रज्ञ कहते हैं।
विषयों का चिन्तन करने वाले पुरुष को उनमें अनुराग हो जाता है, आसक्ति (अनुराग) से कामना होती है और उससे क्रोध की उत्पत्ति होती है।
क्रोध से अज्ञान की उत्पत्ति और इससे स्मृतिभ्रंश होता है, स्मृतिभ्रंश से बुद्धि नष्ट होती है और बुद्धि नष्ट होने से वह प्राणी भी नष्ट हो जाता है।
अनुराग और द्वेष से रहित अपने वश में आयी इन्द्रियों से विषयों का भोग करके भी चित्त को अपने वश में रखने वाले महापुरुष सन्तोष और शान्ति को प्राप्त होते हैं।
सन्तोष की प्राप्ति होने से तीनों प्रकार के दुःख नष्ट हो जाते हैं, इसी प्रकार स्थिरप्रज्ञा वाले योगी का मन प्रसन्न रहता है।
हे राजन्! बिना चित्त प्रसन्न हुए बुद्धि की प्राप्ति नहीं होती और बुद्धि के बिना श्रद्धा नहीं होती, श्रद्धा के बिना शान्ति नहीं होती और शान्ति के बिना सुख नहीं होता।
पवन जिस प्रकार नाव को जल में डुबो देता है, वैसे ही जो मन विषयों में विचरने वाले अवशीभूत इन्द्रियरूपी घोड़ों के पीछे भागता है, वह प्रज्ञा को हर लेता है।
हे राजन्! अज्ञान से आच्छादित सम्पूर्ण प्राणियों के लिये जो आत्मज्ञान रात्रिस्वरूप है, उसमें इन्द्रिय को वश में करने वाले संयमी योगी जागते हैं और जिस विषय बुद्धि में सम्पूर्ण प्राणी जागते हैं, वह विषयभोग ज्ञानियों के लिये रात्रिस्वरूप है।
जिस प्रकार से (नदियों आदि के) सभी जल समुद्र में प्रवेश कर जाते हैं और उसकी तृप्ति नहीं होती, इसी प्रकार सब कामना पूर्ण होने वाले को भी शान्ति नहीं होती।
इस कारण प्राणी को उचित है कि सब प्रकार से विषयों की ओर दौड़ती हुई इन्द्रियों को वश में करे, तब उसकी बुद्धि स्थिर हो जाती है।
जो ममत्व, अहंकार और सब कामनाओं का त्याग करता है, नित्य ज्ञान में मग्न रहता है, वह ज्ञान से मुक्ति को प्राप्त हो जाता है।
हे राजन्! जो वृद्धावस्था को प्राप्त होकर भी दैवगति से इस ब्रह्मज्ञान युक्त बुद्धि को प्राप्त हो जाता है, वह जीवन्मुक्त हो जाता है।
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