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गणेशगीता • अध्याय 1 • श्लोक 31
मानसानखिलान्कामान्यदा धीमांस्त्यजेत्प्रिय । स्वात्मनि स्वेन सन्तुष्टः स्थिरबुद्धिस्तदोच्यते ॥
हे प्रिय! जब यह बुद्धिमान् व्यक्ति मन की सम्पूर्ण इच्छाओं का त्याग कर दे और अपने आत्मा में आप ही से सन्तुष्ट हो जाय, तब यह स्थिर बुद्धि कहलाता है।
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