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गणेशगीता • अध्याय 1 • श्लोक 19
योगमन्यं प्रवक्ष्यामि शृणु भूप तदुत्तमम् । पशौ पुत्रे तथा मित्रे शत्रौ बन्धौ सुहृज्जने ॥
हे राजन्! मैं दूसरा उत्तम योग कहता हूँ, तुम उसे सुनो। पशु, मित्र, पुत्र, शत्रु, बन्धु तथा प्रियजन में
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