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गणेशगीता • अध्याय 1 • श्लोक 42
इन्द्रियाश्वान्विचरतो विषयाननु वर्तते । यन्मनस्तन्मतिं हन्यादप्सु नावं मरुद्यथा ॥६
पवन जिस प्रकार नाव को जल में डुबो देता है, वैसे ही जो मन विषयों में विचरने वाले अवशीभूत इन्द्रियरूपी घोड़ों के पीछे भागता है, वह प्रज्ञा को हर लेता है।
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