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गणेशगीता • अध्याय 1 • श्लोक 2
सूत उवाच अष्टादशपुराणोक्तममृतं प्राशितं त्वया । ततोऽतिरसवत्पातुमिच्छाम्यमृतमुत्तमम् ॥
सूतजी बोले - हे भगवन्! आपने अष्टादश पुराणों के साररूप अमृत का मुझे पान कराया, परंतु अब उससे भी अधिक रसीले उत्तम अमृत का पान करने की मेरी इच्छा है।
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