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गणेशगीता • अध्याय 1 • श्लोक 32
वितृष्णः सर्वसौख्येषु नोद्विग्नो दुःखसङ्गमे । गतसाध्वसरुड्रागः स्थिरबुद्धिस्तदोच्यते ॥
किसी प्रकार के भी संसारी सुखों में तृष्णा न रखने वाला, दुःख में अनुद्विग्न, भय, क्रोध और राग से रहित व्यक्ति ही स्थिरबुद्धि कहा गया है।
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