एवं ब्रह्मधियं भूप यो विजानाति दैवतः ।
तुर्यामवस्थां प्राप्यापि जीवन्मुक्तिं प्रयास्यति ॥
इति श्रीमद्गणेशगीतासूपनिषदर्थगर्भासु योगामृतार्थशास्त्रे श्रीगणेशपुराणे उत्तरखण्डे गजाननवरेण्यसंवादे सांख्यसारार्थयोगो नाम प्रथमोऽध्यायः ॥
हे राजन्! जो वृद्धावस्था को प्राप्त होकर भी दैवगति से इस ब्रह्मज्ञान युक्त बुद्धि को प्राप्त हो जाता है, वह जीवन्मुक्त हो जाता है।
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