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गणेशगीता • अध्याय 1 • श्लोक 43
या रात्रिः सर्वभूतानां तस्यां निद्राति नैव सः । न स्वपन्तीह ते यत्र सा रात्रिस्तस्य भूमिप ॥
हे राजन्! अज्ञान से आच्छादित सम्पूर्ण प्राणियों के लिये जो आत्मज्ञान रात्रिस्वरूप है, उसमें इन्द्रिय को वश में करने वाले संयमी योगी जागते हैं और जिस विषय बुद्धि में सम्पूर्ण प्राणी जागते हैं, वह विषयभोग ज्ञानियों के लिये रात्रिस्वरूप है।
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