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गणेशगीता • अध्याय 1 • श्लोक 13
सम्पादयंति ते भूप स्वात्मना निजबधनम् । संसारचक्रं युञ्जन्ति जडाः कर्मपरा नराः॥
हे राजन्! वे आप ही अपने निमित्त बंधन बनाते हैं, मूढ और कर्मपरायण मनुष्य संसार चक्र में पडते हैं।
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