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गणेशगीता • अध्याय 1 • श्लोक 36
युक्तस्तानि वशे कृत्वा सर्वदा मत्परो भवेत् । संयतानीन्द्रियाणीह यस्यासौ कृतधीर्मतः ॥
इन्द्रियों को वश में करके योगी को सदा मेरे परायण होना चाहिये। जिसकी इन्द्रियाँ वश में हो गयी हैं, उसी को स्थितप्रज्ञ कहते हैं।
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