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गणेशगीता • अध्याय 1 • श्लोक 12
कुर्वति सततं कर्म जन्ममृत्युफलप्रदम् । स्वर्गेश्वर्यरता ध्वस्तचेतना भोगवृद्धयः ॥
इसी कारण वे जन्म और मृत्यु के फल देने वाले कर्मों को सदा करते रहते हैं वे स्वर्ग के ऐश्वयों में ही लगे रहते हैं, उन भोगबुद्धि वालों की चेतना नष्ट हो जाती है।
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