रोगाप्तौ चैव भोगाप्तौ वा जये विजयेऽपि च।
श्रियोऽयोगे च योगे च लाभालाभे मृतावपि ॥
रोग की प्राप्ति हो चाहे भोग की प्राप्ति हो, जय हो या विजय हो, लक्ष्मी की प्राप्ति हो या अप्राप्ति हो, हानि-लाभ, जन्म-मरण - इन सब में मन को समान रखना उचित है।
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