विना प्रसादं न मतिर्विना मत्या न भावना ।
विना तां न शमो भूप विना तेन कुतः सुखम् ॥
हे राजन्! बिना चित्त प्रसन्न हुए बुद्धि की प्राप्ति नहीं होती और बुद्धि के बिना श्रद्धा नहीं होती, श्रद्धा के बिना शान्ति नहीं होती और शान्ति के बिना सुख नहीं होता।
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