गन्धर्वेषु मनुष्येषु तथा तिर्यग्भवेषु च ।
सततं मां हि यः पश्येत्सोऽयं योगविदुच्यते ॥
उरग, गन्धर्व, मनुष्य और पक्षी - इन सब में जो मुझे सदा समान दृष्टि से देखता है, वही योग को जानने वाला कहलाता है।
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