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अध्याय 77 — अथ गन्धयुक्त्यध्यायः

बृहत्संहिता
37 श्लोक • केवल अनुवाद
सफेद केश बाले पुरुष को माला, सुगन्ध द्रव्य, धूप, यत्र, भूषण आदि शोभा नहीं देते; इसलिये अञ्जन और भूषण के सेवन को तरह केश काले करने का भी प्रयत्न करना चाहिये।
सिर्के में कोदो के चावल को रोहे के पात्र में पकाकर उसमें चूर्ण मिला कर खूब बारीक चूर्ण करने के पश्चात् उसको सिर्के से खट्टे किये केशों में लेप करके हरे पत्ते से ढ़क कर
दो पहर तक बैठने के बाद उस लेप को धोकर आँवलों का लेप करके हरे. पत्तों से ढककर दो पहर तक बैठा रहे। तत्पश्चात् शिर को धो डाले; इससे केश काले हो जाते हैं।
केश काले हो जाने के बाद शिरः स्नान और सुगन्धित तेलों के द्वारा लोहे तथा सिकें के गन्धों को दूर करके मनोहर सुगन्धित द्रव्य और धूपों को लगाते हुये राजा को अन्तःपुर में राज्यसुख का सेवन करना चाहिये।
दालचीनी, कूठ, रेणुका (गगनघूरि), नलिका, स्मृक्का, बोल, तगर, नेत्रबाला, नागकेसर, पत्र (गन्धपत्र) - इनको सम भाग लेकर पीसे और फिर शिर में लगाकर स्नान करे तो यह राजा के योग्य शिरः स्नान होता है।
* मञ्जीठ, समुद्रफेन, शुक्ति, दालचीनी, कूठ, बोल-इन सबको बराबर लेकर चूर्ण करे। फिर उस चूर्ण को तिल के तेल में डालकर धूप में तपाये तो उस तेल में चप्पे के फूलों के तेल की गन्ध आ जाती है।
गन्धपत्र, सिह्नक, नेत्रबाला, तगर-इन सबको सम भाग लेकर मिलाने से कामो- द्दीपन करने वाली गन्ध हो जाती है। इस गन्ध में व्यामक (दवदग्धक) मिला कर कटुका (गुगुल) और हिदू का धूप देने से मौलसरी पुष्प के समान सुगन्धित द्रव्य ब- कुठ मिलाने से नील कमल की, सफेद चन्दन मिलाने से चम्पे के फूलों की तथा जायफल, दालचीनी और धनियाँ मिलाने से अतिमुक्तक के पुष्प की गन्ध आ जाती है।
सौंफ और कुन्दरक ( देवदारु वृक्ष का निर्यास) एक चतुर्थाश, नख (शंख से उत्पन्न चमड़ा) और सिह्नक दो चतुर्थांश, घेत चन्दन और प्रियङ्गु एक चतुांश - इन सबको मिलाकर गन्धद्रव्य बनावे। फिर उसमें गुड और नख का धूप दे ( पहले हरें का धूप देकर बाद में उक्त द्रव्य का धूप देना-यह प्राचीनों का मत है) ।
गूगल, नेत्रवाला, लाख, मोथा, नख, खाँड-इन सबको बराबर लेकर धूप बनावे तथा बालउड़, नेत्रवाला, सिहक, नख, चन्दन-इन सबको सम भाग लेकर पिण्ड नामक दूसरा धूप बनावे ।
हरें, शंख, नख, बोल, नेत्रबाला, गुड, कूठ, शैलक, मोथा- इन नौ वस्तुओं को क्रम से एक पाद से लेकर नौ पाद तक ले। जैसे हरें एक पाद, शंख दो पाद, नख तीन पाद इत्यादि मोथा नौ, पाद = एक धूप। गुड, कूठ, शैलक, मोधा-इन चार वस्तुओं को क्रम से एक पाद से लेकर चार पाद तक ग्रहण करे तो दूसरा धूप। शैलक, मोथा- इन दो वस्तुओं को क्रम से एक पाद से लेकर दो पाद तक ले तो तीसरा पूप। हदें एक भाग में संख दो भाग मिलाने से चौथा धूप। उसमें नख तीन भाग मिलाने से पाँचवाँ धूप इत्यादि अनेक प्रकार के मनोहर धूप बनते हैं।
खाँड़, शैलेय और मोचा चार भाग; श्रीवास, सर्ज, नख और गूगल दो भाग- इन सबको पीस कर कर्पूर के चूर्ण से बोध (सुगन्धित) करे। बाद में उसमें शहद मिलाकर पिण्ड बना ले। यह कोपच्छद नामक राजाओं के योग्य धूप होता है। आई वस्तु में आर्द्र बस्तु को मिलाने का नाम बेध और चूर्ण में चूर्ण मिलाने का नाम बोध है।
विना दालचीनी, खस, गन्धपत्र- इनके तीन भाग में सबका आधा ( डेढ़ ) भाग छोटी इलायची मिलाकर चूर्ण बनाये। कस्तूरी या कर्पूर से बोध करे तो वल सुगन्धित करने का उत्तम चूर्ण बनता है।
मोथा, नेत्रबाला, शैलेय, कचूर, खश, नागकेसर के फूल, व्याघ्रनख, स्पृक्का (लता), अगुरु, दमनक, नख, तगर, धनियाँ,
कर्पूर, चोरक, श्वेत चन्दन-इन सोलह द्रव्यों में से किन्हीं चार के क्रम से एक भाग, दो भाग, तीन भाग और चार भाग अदल- बदल कर लेकर चूर्ण बनाने से गन्धार्णव नामक छियानवे तरह के सुगन्धद्रव्य तैयार होते हैं।
धनियाँ और कर्पूर में अति उत्कट गन्ध होने के कारण सदा धनियाँ का एक भाग और कर्पूर के एक भाग से भी कम भाग डालना चाहिये। इन दोनों के दो-तीन आदि भाग कभी नहीं डालना चाहिये; क्योंकि इनमें अति उत्कट गन्ध होने के कारण ये अन्य द्रव्यों के गन्धों का नाश कर देते हैं।
पूर्वोक्त समस्त गन्धित द्रव्यों को श्रीवास, राल, गुड़, नख-इन चारों का अलग- अलग धूप दे, सबको मिलाकर नहीं; बाद में कर्पूर और कस्तूरी का बोध दे।
पूर्वोक्त सुगन्धित द्रव्यों के भेद से कुल मिलाकर १७४७२० प्रकार के सुगन्धित द्रव्य बनते हैं।
केवल दो वस्तुओं से छ: गन्धद्रव्य तैयार होते हैं; जैसे-प्रथम के एक भाग में द्वितीय के दो-तीन और चार भाग मिलाने से तीन प्रकार के तथा द्वितीय के एक भाग में प्रथम के दो-तीन और चार भाग मिलाने से तीन प्रकार के; इस तरह छः प्रकार के गन्धद्रव्य तैयार होते हैं। इसी तरह एक के दो भाग में अन्य के दो-तीन और चार भाग मिलाने से छ: प्रकार के गन्धद्रव्य तैयार होते हैं।
इस तरह एक द्रव्य के योग से छः भेद, चार द्रव्यों के योग से चौबीस भेद एवं शेष तोन स्थानों में स्थित चार-चार के बहत्तर भेद और सब मिलाकर छियानचे भेद होते हैं।
अस्मिन् द्रव्यगणे षोडशके षोडशसहुये चतुर्विकल्पेन चतुर्भिश्चतुर्भिर्द्रव्यरेकैको गन्ध इत्यनेन क्रमेण भिद्यमानानामष्टादश शतानि विंशत्यधिकानि गन्धानां जायन्ते उत्पद्यन्ते। एतत्पुरस्तादाचार्य एवं प्रदर्शयिष्यति ।
सोलह द्रव्यों में से चार-चार विकल्प करके लाये हुए भेद (१८२०) को पूर्वकथित (९६) भेद से गुणा करने से १७४७२० भेद होते हैं; किन्तु ये भेद गौण वृत्ति से आते हैं। मुख्य वृत्ति से तो १८२० को २४ से गुणा करने से ४३६८० भेद होते हैं।
एक से लेकर जितने द्रव्य हों, उतनी संख्या तक नीचे से लेकर ऊपर को गई हुई पंक्ति में अंकों को लिखे और पूर्व-पूर्व गताङ्क में ऊपर के अङ्कों को जोड़ता जाय। यहाँ अन्तिम स्थान को छोड़कर संख्या होती है। अभीष्ट विकल्पों से चरलोष्टक को अन्यत्र ले जाकर उसको वहाँ छोड़कर फिर अन्य चरलोष्टक को अन्यत्र ले जाय।
सोलह कोष्ठ का पूर्ववत् एक चक्र बाधुकर उसकी प्रथम पंक्ति में अगर दो भाग, गन्धपत्र तीन भाग, सिद्धक पाँच भाग और शैलेय आठ भाग रक्खे। द्वितीय पंक्ति में प्रियङ्गु पाँच भाग, मुस्ता आठ भाग, बोल दो भाग और शालोजातक (हीवेर) तीन भाग रक्खे।
तृतीय पंक्ति में स्मृक्का चार भाग, त्वक् एक भाग, तगर सात भाग और मांसी छ: भाग रक्खे तया चतुर्थ पंक्ति में चन्दन सात भाग, नख छः भाग, श्रीवास चार भाग और कुन्दरु एक भाग रक्खे।
इस सोलह कोष्ठ वाले कच्छपुट में जिन-जिन चार द्रव्यों के भागों का योग करने से अट्ठारह हो जायें, उतने प्रकार के गन्धयोग बनते हैं। इस तरह मिश्रित अट्ठारह भागों में नख, तगर और सिद्धक सम भाग लेकर मिलावे।
जायफल, कर्पूर और कस्तूरी सम भाग लेकर उद्बोधन करे तथा गुड़ और नख का धूप दे। इस तरह करने से सर्वतोभद्र नाम के अनेक प्रकार के गन्ध बन जायेंगे। इस चक्र में ऊर्ध्वाध, तिर्यक् या कोणाकृति क्रम से भागों को जोड़ने से सब जगह अट्ठारह भाग होते हैं। अतः इन गन्धद्रव्यों का नाम सर्वतोभद्र है।
पूर्वोक्त द्रव्यों में से नियमानुसार अपनी इच्छा से किन्हीं चार द्रव्यों को लेकर जायफल, कस्तूरी और कर्पूर से उद्बोधित करके आम के रस से युक्त शहद से सिक्त करने पर पारिजातपुष्पसदृश गन्य बाले बहुत तरह के मुखवास बनते हैं।
पूर्वकथित कच्छपुट में सर्जरस (राल) और श्रीवासक से युत जितने धूप कहे गये हैं, उनमें श्रीवास और सर्जरस न मिलाकर नेत्रबाला और दालचीनी मिला देने से अनेक प्रकार के स्नान करने के लिये चूर्ण बन जायेंगे ।
सोध्र, खस, तगर, अगुर, मुस्ता, गन्धपत्र, प्रिय, वर (परिपेलव), हरीतकी- इन नव द्रव्यों को लेकर पूर्वकथित रीति से
बाहुनको केकच्छपुर से क्रम से टीन-तीन द्रव्य इकट्टा करके एक एका शुक्तिधा भाग और सौफ एक भाग का चतुरित और गुड का धूप देने पर चौरासी प्रकार के बकुलपुष्य के समान न्याय है।
हरड के चूर्ण से युत गोमूत्र में साक्षिदिन तक दन्तकाष्ठों का भोंगो कर उनको उसमें से निकाल कर आगे कथित गन्धोदक में डाल दे।
इलायची, दालचीनी, गन्धपत्र, सौवीर, शहद, काली मिर्च, नागकेसर, कूठ इन सबको सम भाग लेकर गन्यजल बनाकर फिर उस गन्धजल में कुछ समय के लिये उन दन्तकाष्ठों को भोंगोये रक्खे।
इसके बाद जाय- फल चार भाग, गन्धपत्र दो भाग, इलायची एक भाग और कर्पूर तीन भाग लेकर एक जगह करके बारीक चूर्ण बनाकर उस चूर्ण को इन दन्तकाष्ठों से मसल कर दन्तकाष्ठों को धूप में सुखा कर रक्खे ।
पूर्वसिद्ध दन्तकाष्ठों को सेवन करने से पुरुषों के प्रसत्र वर्ण, उत्तम मुख की कान्ति, मुख शुद्ध और सुगन्धियुत तथा कानों को सुख देने वाली वाणी होती है।
पान काम को प्रदीप्त करता है, शरीर की शोभा को बढ़ाता है, सौभाग्य करता है, मुख को सुगन्धियुत करता है, बल को बढ़ाता है, कफ से उत्पन्न रोगों का नाश करता है और अन्य गुण (कण्ठशुद्धि आदि) भी करता है।
ठीक-ठीक (न अधिक न कम) चूना से युक्त पान राग करता है, अधिक सुपारी- युत पान राग का नाश करता है, अधिक चूना से युत पान मुख को दुष्ट गन्धयुत करता है और पत्ते अधिक हों तो सुगन्धियुत करता है।
रात में पान खाना हो तो पत्ता और दिन में खाना हो तो सुपारी अधिक डालकर खाना अच्छा होता है, इससे उलटा ( रात में सुपारी और दिन में पत्ता अधिक डालकर) खाने से केवल उपहास होता है। फक्कोल, सुपारी, लयलोफत (लवङ्गपुष्ण-लक्न में फूल नहीं होता; अतः फूल के स्थान पर फल का ग्रहण करना चाहिये) और जाती- फल से युत पान खाने से मनुष्य को मद के हर्ष से प्रसत्रता की प्राप्ति होती है।
Krishjan
धर्म का अन्वेषण
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