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बृहत्संहिता • अध्याय 77 • श्लोक 7
तुल्यैः पत्रतुरुष्कबालतगरैर्गन्यः स्मरोद्दीपनः सव्यामो बकुलोऽयमेव कटुकाहिङ्गुप्रधूपान्वितः । कुष्ठेनोत्पलगन्धिकः समलयः पूर्वी भवेच्चम्पको जातीत्वक्सहितोऽतिमुक्तक इति ज्ञेयः सकुस्तुम्बुरुः ॥
गन्धपत्र, सिह्नक, नेत्रबाला, तगर-इन सबको सम भाग लेकर मिलाने से कामो- द्दीपन करने वाली गन्ध हो जाती है। इस गन्ध में व्यामक (दवदग्धक) मिला कर कटुका (गुगुल) और हिदू का धूप देने से मौलसरी पुष्प के समान सुगन्धित द्रव्य ब- कुठ मिलाने से नील कमल की, सफेद चन्दन मिलाने से चम्पे के फूलों की तथा जायफल, दालचीनी और धनियाँ मिलाने से अतिमुक्तक के पुष्प की गन्ध आ जाती है।
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