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बृहत्संहिता • अध्याय 77 • श्लोक 34
वर्णप्रसादं वदनस्य कान्तिं वैशद्यमास्यस्य सुगन्धितां च । संसेवितुः श्रोत्रसुखां च वाचं कुर्वन्ति काष्ठान्यसकृद्भवानाम् ॥
पूर्वसिद्ध दन्तकाष्ठों को सेवन करने से पुरुषों के प्रसत्र वर्ण, उत्तम मुख की कान्ति, मुख शुद्ध और सुगन्धियुत तथा कानों को सुख देने वाली वाणी होती है।
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