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बृहत्संहिता • अध्याय 77 • श्लोक 8
शतपुष्पाकुन्दुरुकौ पादेनार्थेन नखतुरुष्कौ च। मलयप्रियङ्गुभागी गन्यो धूप्यो गुडनखेन ॥
सौंफ और कुन्दरक ( देवदारु वृक्ष का निर्यास) एक चतुर्थाश, नख (शंख से उत्पन्न चमड़ा) और सिह्नक दो चतुर्थांश, घेत चन्दन और प्रियङ्गु एक चतुांश - इन सबको मिलाकर गन्धद्रव्य बनावे। फिर उसमें गुड और नख का धूप दे ( पहले हरें का धूप देकर बाद में उक्त द्रव्य का धूप देना-यह प्राचीनों का मत है) ।
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