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बृहत्संहिता • अध्याय 77 • श्लोक 18
एकैकमेकभागं द्वित्रिचतुर्भागिकैर्युतं द्रव्यैः। षड्ङ्गन्यकरं तद्वद्द्द्वित्रिचतुर्भागिकं कुरुते ॥
केवल दो वस्तुओं से छ: गन्धद्रव्य तैयार होते हैं; जैसे-प्रथम के एक भाग में द्वितीय के दो-तीन और चार भाग मिलाने से तीन प्रकार के तथा द्वितीय के एक भाग में प्रथम के दो-तीन और चार भाग मिलाने से तीन प्रकार के; इस तरह छः प्रकार के गन्धद्रव्य तैयार होते हैं। इसी तरह एक के दो भाग में अन्य के दो-तीन और चार भाग मिलाने से छ: प्रकार के गन्धद्रव्य तैयार होते हैं।
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