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अध्याय 2 — द्वितीयोपदेश

घेरण्ड संहिता
40 श्लोक • केवल अनुवाद
समस्त आसन उतने ही हैं जितने संसार में जीवजन्तु हैं प्राचीन समय में शिवजी ने उनकी चौरासी लाख संख्या कही है।
उनके भी मध्य में चौरासी सौ आसन विशेष कहे हैं और मनुष्य लोक में उनमें भी विशेषत: बत्तीस आसन ही शुभ हैं।
सिद्धासन, पदमासन, भद्रासन, मुक्तासन, वज्रासन, स्वस्तिकासन, सिहीँसन, गोमुखासन, वीरासन, धनुरासान, मृतासन, गुप्तासन, मत्स्यासन, मत्स्येन्द्रासन, गोरक्षासन, पश्चिमोत्तानासन, उत्कटासन, संकटासन, मयूररासन, कुक्कुटासन, कूर्मासन, उत्तानकूर्मासन, उत्तानमण्ड्कासन, वृक्षासन, मण्ड्कासन, गरुडासन, वृषभासन, शलभासन, मकरासन, उष्ट्रासन, भुजङ्गासन, योगासन, (ये सब) कुल बत्तीस आसन मनुष्यलोक में सिद्धियाँ देने वाले हैं।
पैर की एड़ी को योनिस्थान के नीचे लगाये, पुन: इतर गुल्फ (दूसरे पैर की एड़ी) को मेढ़ या लिङ्गमूल में रखे। पुनः चिबुक (ठोड़ी) को हृदय में लगाकर समस्त इन्द्रियों को संयम करके अचल दृष्टि से भ्रुवो के मध्य में देखते हुए (दृष्टि को स्थिर करे, इस प्रकार) मोक्ष की सिद्धि की जाती है। इस प्रकार करने से सिद्धासन फलदायी कहा जाता है।
वाम जंघा के ऊपर दक्षिण जंघा को रखकर तथा दक्षिण जंघा पर वामचरण को स्थापित करके तथा पीछे से दोनों हाथों से पैरों के अगुष्ठों को दृढ़ता से पकड़कर तथा चिबुक (ठोड़ी) को हृदय पर निधान करके नासिका के अग्रभाग को देखना चाहिये। यह पद्मासन सब व्याधियों को नष्ट करता है।
(भ्रदासन की विधि बताते हैं-) अंडकोश के नीचे दोनों एड़ी व्युत्क्रम (उल्टा करके) रखे, फिर दोनों हाथों से पीछे से पैरों के अंगुष्ठों को पकड़े।
फिर जालन्धर करके नासिका के अग्रभाग को देखना चाहिये। इस प्रकार सब व्याधियों का विनाश करने वाला यह भ्रदासन होता है।
(मुक्तासन को बताते है-) वाम एड़ी को पायमूल (गुदा स्थान) में और दक्षिण एड़ी को उसके ऊपर रखकर सिर, गर्दन, को समान भाव से (स्थिरभाव) से रखना चाहिये। (इस प्रकार) यह मुक्तासन सिद्धिदायक होता है।
(ब्रजासन क्या है-) दोनों जंघाओं को वञ्रवत्‌ (समानसुदृढ़ भाव में) करके गुदा के पार्श्व (दोनों ओर) दोनों पैरों को रखना, यह वज्रासन योगियों को सिद्धि देने वाला है।
(स्वस्तिकासन की विधि बताते हैं-) दोनों पादतलों (पैरों) और जानुओं (पिंडलियों) को जाँधों के मध्य में करके ऋजुकाय रूप (त्रिकोणाकाररूप) में बैठे, इसे स्वस्तिकासन कहा जाता है।
(सिंहासन की विधि-) दोनों एड़ियों को अडकोशों के नीचे उलटकर ऊपर को करके रखे। दोनों जानुओं को भूमि पर संस्थित करके और उनके ऊपर मुख को खोलकर जालंघर को और नासिका के अग्रभाग को देखना चाहिये। इस प्रकार यह सिंहासन सब व्याधियों का विनाश करने वाला होता है।
(गोमुखासन क्या है-) दोनों पैरों को भूमि पर स्थापित करके पीठ के पार्श्वभागों में लगाना चाहिये, शरीर को स्थिर करके आकृति गोमुख क समान हो जाती है, यही गोमुखासन है।
(वीरासन विधि बताते हैं-) एक पैर को ही एक जंघा के ऊपर रखे तथा दूसरा पेर पीछे की ओर रखे, इस प्रकार यह वीरासन कहा गया है।
(धनुरासन की विधि बताते हैं-) दोनों पैरों को भूमि पर दण्ड रूप में फैलाकर, हाथों को पीछे करके दोनों पैरों को पकड़े, इसके बाद शरीर को धनुष के समान करके अङ्गों को परिवर्तित करे, इधर-उधर पलटे।
(फिर मृतासन विधि देखें-) शव के समान भूमि में सीधा शयन करना शवासन कहलाता है। यह शवासन श्रम को हरने वाला और चित्त को विश्राम दिलाने का कारण होता है।
गुप्तासन - दोनों जानुओं के मध्य में पैरो को करके गोपन भाव से रखना चाहिये। तथा पैरों पर गुदा को रखे, इसे गुप्तासन कहा जाता है।
मत्स्यासन - मुक्तपद्मासन लगाकर घुटनों में सिर का वेष्टन करके सीधे होकर (चित्तहोकर) शयन करें, इस प्रकार यह मत्स्यासन सब रोगों का नाशक होता है।
पश्चिमोत्तानासन - दोनों पैरों को भूमि पर दण्ड रूप में फैला कर और सिर को जंघाओं के मध्य रखकर और दोनों हाथों से पैरों को पकड़े, इसे पश्चिमोत्तासन कहते हैं।
मस्त्येन्द्रासन - उदर को पीठ जैसा करके पेट को और वाम पैर को नवाकर दायें पैर की जंघा पर रखे।
मत्स्येन्द्रासन - पुन: वामपैर पर दायें पैर की एड़ी को रखे तथा दायें हाथ पर मुख को रखे, और भ्रुवो के मध्य में दृष्टि को करे, यह मत्स्येन्द्रासन होता है।
गोरक्षासन - दोनों पैरों को उरुओं और जंघाओं के बीच में चित्त रखकर अव्यक्त (गोपनीय) भाव से रखे, फिर दोनों हाथों से एडियों को पकड़ ले।
पुन: कण्ठ को सिकोड़कर नासाग्र को देखना चाहिये। योगियों के सिद्धि देने वाले इसी आसन को गोरक्षासन कहा है।
उत्कटासन - भूमि पर पैरों के अंगूठों को बलपूर्वक रखकर दोनों एड़ियों को ऊपर उठाकर उनके ऊपर गुदा को रखकर उत्कटासन जाना जाता है।
संकटासन - पृथ्वी पर वाम पैर और अंगुष्ठ को लगाकर, दायें पैर से वाम पैर को वेष्टित करे (लपेटे), पुन: दोनों जंघाओं पर हाथों को रखे, यह संकटासन होता है।
मयूरासन - दोनों हाथों के तलो से बल से भूमि पर स्थिर होकर उनके कर्पूर (हाथ के मणिबन्ध के समीप के भागों) को नाभि के पार्श्व भागों पर रखकर ऊपर दण्डवत्‌ आसन में होना मयूरासन होता है।
कुक्कुटासन - पद्यासन लगाकर जानु और उरुओं के मध्य में हाथों को घुसाकर कर्पूर भागों (हथेली के पिछले भागों) पर मञ्चस्थ समासीन हो, यही कुक्कुटासन है।
कूर्मासन - अण्डकोश के नीचे दोनों एड़ियों को रखकर व्युत्क्रम से (विपरीत रूप से) रखे। सिर, गर्दन को और शरीर को क्रजुवत्‌ (सीधे) रखे, यह कूर्मासन कहा गया है।
उत्तान कूर्मासन - प्रथम तो कुक्कुटासन बाँधे, पुनः हाथों से कन्धा पकड़कर पुन: कछुवे के समान चित्त हो जाये, यह उत्तानकूर्मासन होता है।
उत्तान कूर्मासन - मण्डूकासन में बैठकर हाथों के पिछले भागों से (कर्पूरो) से मस्तक को धारण कर उत्तान हो जाये। यह उत्तान मण्डूकासन होता है।
वृक्षासन - वाम जंघा की जड़ में दायें पैर को रखकर पुन: वृक्ष के समान भूमि पर खड़ा हो, यही वृक्षासन है।
मण्डूकासन - पीछे के भाग में दोनों पैरो को करके और अंगुष्ठों को परस्पर स्पर्श करे तथा दोनों जानुओं को सामने रखे, यह मण्ड्कासन होता है।
गरुडासन - जंघा और उरुओं (पिंडलियों) से भूमि को दबाकर शरीरस्थ होकर जानुओं पर दोनों हाथों को रखे, यह गरुडासन कहा जाता है।
वृषासन बताते हैं - दायीं एड़ी के ऊपर मलद्वार को तथा वामभाग में इतर पैर को विपरीत करके रखे, भूमि को स्पर्श करे, यही वृषासन होता है।
शलभासन - पहले नीचे मुख करके लेट जाये, दोनों हाथों को छाती में रख, करतलों से भूमि को पकड़ पुनः पैरों को शून्य में ऊपर की ओर फैलाये, इसे मुनिजन शलभासन कहते हैं।
मकरासन - नीचे मुख करके लेटे, पुनः भूमि पर हृदय रखकर पैरों को फैलाकर पुन: हाथों से सिर को धारण करे, जठराग्नि बढ़ाने वाला यह मकरासन होता है।
उष्ट्रासन - नीचे मुख करके शयन करे, पुनः दोनों पैरों को पीछे से लाकर दोनों हाथों से धारण करे, तथा उदर और मुख को दृढता से आकुंचन (सिकोड़) ले, इसे योगीजन उष्ट्रासन कहते हैं।
अंगुष्ठ से लेकर नाभि पर्यन्त नीचे भूमि पर रखकर, करतलों से धरा को अवलम्बित करके सिर को सर्प के फन के समान ऊपर करे, यही भुजंगासन है।
भुजंगासन - भुजंगासन से नित्य ही जठराग्नि बढ़ती है, सब रोगों का विनाश होता है, भुजंगासन की साधना से भुजगी देवी जागती है अर्थात्‌ इस आसन को करने से कुंडलिनी शक्ति जाग्रत होती है।
पैरों को उत्तान (चित्त) करके और जंघाओं पर स्थापित करके पुन: आसन पर स्थित करके हाथों को उत्तान भाव से रखे।
तत्पश्चात्‌ पूरक वायु को खींचकर अर्थात्‌ कुंभक करके नासिका के अग्रभाग को देखना चाहिये। योगियों के योगसाधन में यही योगासन होता है।
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