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घेरण्ड संहिता • अध्याय 2 • श्लोक 4
योनिस्थानकमङ्घ्रिमूलघटितं संपीड्य गुल्फेतरम्‌ मेढे सम्प्रणिधाय तं तु चिबुकं कृत्वा हृदि स्थापितम्‌ । स्थाणुः संयमितेन्द्रियोऽचलदृशा पश्यन्‌ भ्रुवोरन्तर- मेवंमोक्षविधायतेफलकरं सिद्धासनं प्रोच्यते ॥
पैर की एड़ी को योनिस्थान के नीचे लगाये, पुन: इतर गुल्फ (दूसरे पैर की एड़ी) को मेढ़ या लिङ्गमूल में रखे। पुनः चिबुक (ठोड़ी) को हृदय में लगाकर समस्त इन्द्रियों को संयम करके अचल दृष्टि से भ्रुवो के मध्य में देखते हुए (दृष्टि को स्थिर करे, इस प्रकार) मोक्ष की सिद्धि की जाती है। इस प्रकार करने से सिद्धासन फलदायी कहा जाता है।
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