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घेरण्ड संहिता • अध्याय 2 • श्लोक 33
याम्यगुल्फे पायुमूलं वामभागे पदेतरम्‌ । विपरीतं स्पृशेद्‌भूमिं वृषासनमिदं भवेत्‌ ॥
वृषासन बताते हैं - दायीं एड़ी के ऊपर मलद्वार को तथा वामभाग में इतर पैर को विपरीत करके रखे, भूमि को स्पर्श करे, यही वृषासन होता है।
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