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घेरण्ड संहिता • अध्याय 2 • श्लोक 37
अड्गुष्ठनाभिपर्यन्तम धो भूमौ विनिन्यसेत्‌ । करतलाभ्यां धरां धृत्वा ऊर्ध्वशीर्षः फणीव हि ॥
अंगुष्ठ से लेकर नाभि पर्यन्त नीचे भूमि पर रखकर, करतलों से धरा को अवलम्बित करके सिर को सर्प के फन के समान ऊपर करे, यही भुजंगासन है।
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