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घेरण्ड संहिता • अध्याय 2 • श्लोक 5
वामोरुपरि दक्षिणं हि चरणं संस्थाप्य वामं तथा दक्षोरूपरि पश्चिमेन विधिना कृत्वा कराभ्यां दृढम्‌ । अङ्गुष्ठौ हृदये निधाय चिबुकं नासाग्रमालोकयेद्‌ एतङ्घ्याधिविनाशकारणपरं पद्मासनं प्रोच्यते ॥
वाम जंघा के ऊपर दक्षिण जंघा को रखकर तथा दक्षिण जंघा पर वामचरण को स्थापित करके तथा पीछे से दोनों हाथों से पैरों के अगुष्ठों को दृढ़ता से पकड़कर तथा चिबुक (ठोड़ी) को हृदय पर निधान करके नासिका के अग्रभाग को देखना चाहिये। यह पद्मासन सब व्याधियों को नष्ट करता है।
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