सिद्धं पद्मं तथा भ्रं मुक्तं वञ्रञ्च स्वस्तिकम् । सिंहञ्च गोमुखं वीरं धनुरासनमेव च ॥
मृतं गुप्तं तथा मत्स्यं मत्स्येन्द्रासनमेव च । गोरक्षं पश्चिमोत्तानं उत्कटं सङ्कटं तथा ॥
मयूरं कुक्कुटं कूर्म तथाचोत्तानकूर्मकम् । उत्तानमण्डूकं वृक्षं मण्डूकं गरुडं वृषम् ॥
शलभं मकरं चोष्ट्रै भुजङ्गञ्चयोगासनम् । द्वत्रिंशदासनानि तु मर्त्यलोके हि सिद्धिदम् ॥
सिद्धासन, पदमासन, भद्रासन, मुक्तासन, वज्रासन, स्वस्तिकासन, सिहीँसन, गोमुखासन, वीरासन, धनुरासान, मृतासन, गुप्तासन, मत्स्यासन, मत्स्येन्द्रासन, गोरक्षासन, पश्चिमोत्तानासन, उत्कटासन, संकटासन, मयूररासन, कुक्कुटासन, कूर्मासन, उत्तानकूर्मासन, उत्तानमण्ड्कासन, वृक्षासन, मण्ड्कासन, गरुडासन, वृषभासन, शलभासन, मकरासन, उष्ट्रासन, भुजङ्गासन, योगासन, (ये सब) कुल बत्तीस आसन मनुष्यलोक में सिद्धियाँ देने वाले हैं।
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