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घेरण्ड संहिता • अध्याय 2 • श्लोक 31
पृष्ठदेशे पादतलौ अडगुष्ठे द्वे च संस्पृशेत्‌ । जानुयुग्मं पुरस्कृत्य साधयेन्मण्डुकासनम्‌ ॥
मण्डूकासन - पीछे के भाग में दोनों पैरो को करके और अंगुष्ठों को परस्पर स्पर्श करे तथा दोनों जानुओं को सामने रखे, यह मण्ड्कासन होता है।
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