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घेरण्ड संहिता • अध्याय 2 • श्लोक 11
गुल्फौ च वृषणस्याधो व्युत्क्रमेणोर्ध्वतां गतौ । चितिमूलो भूमिसंस्थो कृत्वा च जानुनोपरि ॥ व्यक्तवक्त्रो जलंध्रञ्च नासाग्रमवलोकयेत्‌ । सिंहासनं भवेदेतत्‌ सर्वव्याधिविनाशकम्‌ ॥
(सिंहासन की विधि-) दोनों एड़ियों को अडकोशों के नीचे उलटकर ऊपर को करके रखे। दोनों जानुओं को भूमि पर संस्थित करके और उनके ऊपर मुख को खोलकर जालंघर को और नासिका के अग्रभाग को देखना चाहिये। इस प्रकार यह सिंहासन सब व्याधियों का विनाश करने वाला होता है।
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