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अध्याय 24 — अथ रोहिणीयोगाध्यायः

बृहत्संहिता
36 श्लोक • केवल अनुवाद
सुवर्ण-पाषाण के समुदाय में उत्पन्न वृक्षों के पुष्पों पर बैठे हुये भ्रमरों के शब्दों में संयुत, नाना प्रकार के पक्षियों के आलाप से मिश्रित
विद्याधारियों के गौत से उत्पत्र मधुर शब्दों से पुत और सुमेरु पर्वत पर स्थित उपवन में नारद के लिए बृहस्पति तथा अपने शिष्यों के लिये गर्ग,
अपने शिष्यों के लिये गर्ग, पराशर, काश्यप और मयासुर ने रोहिणी-चन्द्रसमागम के सम्बन्ध में जो कहा है, उसको घोड़े पदों के द्वारा कहने के लिये में उद्यत हुआ हूँ।
आषाढ़ के कृष्णपक्ष में रोहिणी-चन्द्र का समागम देखकर ग्रहचिन्तक दैवज्ञों को शास्त्र में कथित प्रकार के द्वारा संसार का शुभाशुभ कहना चाहिये। भूत के प्रयोजनाभाव होने के कारण आगे का ही रोहिणीयोग कहना चाहिये
यह योग पञ्चसिद्धान्तिका में मैंने (वराह- मिहिर ने ) कह दिया है। चन्द्रविम्बप्रमाण, चन्द्र की कान्ति, चन्द्र का वर्ण, चन्द्र का मार्ग, अनेक तरह के उत्पात और वायु के द्वारा संसार का शु। शुभ कहना चाहिये ।
नगर से उत्तर या पूर्व दिशा में ब्राह्मण हवन करते हुये तीन दिन उपवास करे। बाद में अश्विनी आदि सब नक्षत्रों के साथ सूर्य आदि नव ग्रहों को लिखकर धूप, पुष्प और बलि से उनका पूजन करे।
रत्न, जल और औषधि से पूर्ण, पल्लव से आच्छादित, अनेक तरह से पूजित, अकाल मूल ( अग्निपाक के द्वारा श्याम वर्ण से रहित अधोभाग वाले) कलशों से अलंकृत चारों दिशायें और कुशों से आच्छादित स्थण्डिल पर बैठे।
बाद में महाव्रत नामक मन्त्र से अभिमन्त्रित सभी चीजों को कलश में डालकर सुवर्ण और कुशायुत जल से परिपूर्ण करे तथा वायु, वरुण और चन्द्र के मन्त्र से हवन करे ।
बारह हाथ ऊँचे बाँस पर पतली और दण्डप्रमाण (चार हाथ लम्बी) पताका बाँधे। पहले दिग्ज्ञान करके रोहिणीयोग में स्थित चन्द्र के समय में उस पताका द्वारा किस तरफ की वायु है इसका ज्ञान करना चाहिये।
वहाँ वर्षा के निमित्त प्रहर से पक्ष और प्रहरांश से दिन की कल्पना करनी चाहिये। जैसे रोहिणीगत चन्द्र के दिन सूर्योदय से लेकर अग्रिम सूर्योदय तक आठ प्रहरों में से प्रथम प्रहर से लेकर स्थापित पताका द्वारा वायु की परीक्षा करे। यदि दिन के प्रथम प्रहर में सुन्दर वायु चले तो ब्रावण कृष्ण में, द्वितीय प्रहर में चले तो श्रावण शुक्ल में, तृतीय प्रहर में वायु चले तो भाद्र कृष्ण में, चतुर्थ प्रहर में वायु चले तो भाद्र शुक्ल में, रात्रि के प्रथम प्रहर में वायु चले तो आश्विन कृष्ण में, द्वितीय प्रहर में वायु चले तो आश्विन शुक्ल में, तृतीय प्रहर में बायु चले तो कार्तिक कृष्ण में और चतुर्थ प्रहर में सुन्दर बायु चले तो कार्तिक शुक्ल में सुन्दर वृष्टि होती है। यदि सूर्योदय से आधे प्रहर तक सुन्दर वायु चले तो श्रावण कृष्णादि के साढ़े सात दिन, उसके आधे काल तक में सवा चार दिन इत्यादि वृष्टि कहनी चाहिये। कोई पक्ष की जगह मास का ग्रहण करते हैं।
रोहिणी में स्थित चन्द्र के समय घड़े में दिये हुये बोजों में से जिनके जितने अंश अङ्कुरित हों, उतने की उस वर्ष में वृद्धि होती है।
शान्त, मधुर बोलने वाले पक्षी और जंगली जानवरों से शब्दायमान दिशा, निर्मल आकाश और सुन्दर वायु शुभ है। अब इसके अनन्तर मेघ और वायु का फल कहते हैं।
पेट की तरफ से कुण्डलाकार होने के कारण पृष्ठमात्र दिखाई देने वाले सर्पों की तरह; अतः कहीं पर कृष्ण-चेत, कहीं-कहीं पर केवल घेत, कहीं पर केवल कृष्ण विशाल और चमकती हुई बिजली के समान जीभ वाले
विकसित कमल के अन्दर के समान स्वच्छ कान्ति बाले, प्रान्त भाग में लोहित वर्ण की तरह कान्ति वाले तथा भ्रमर, कुङ्कुम और पुष्प की तरह स्वच्छ कान्ति वाले मेषों से युत आकाश रोहिणी-योग के समय में शुम होता है।
बिजली, इन्द्रधनु और कृष्ण वर्ण के मेयों से युत होने के कारण विचित्र वर्ण का आकाश मानो दावाग्नि, हाथी और भैंसों से आकुलित वन को तरह रोहिणी योग के समय में शुभ होता है।
अथवा अञ्जन पर्वत के काले पत्थरों के समान मेघों से युत या हिम, मोती, शंख और चन्द्र-किरण की कान्ति को हरण करने वाले मेपों (चेत वर्ण के पंपों ) से युत आवारा रोहिणी योग के समय में शुभ होता है।
बिजली रूप मध्यबन्धन (करधनी), हंसपंक्ति रूप आगे के दाँत, गिरते हुये जलरूप मद, चलते हुये अग्रभागरूप हाथ, विचित्र इन्द्रधनु के समान ऊँची ध्वजा वाले, तमाल वृक्ष और भ्रमर की तरह काले हाथों को तरह मेघों से व्याप्त आकाश रोहिणों के समय में शुभ होता है।
जिस आकाश में सन्ध्याकालिक राग से रंगे, नील कमल के समान मानो पीताम्बर पहने हुए विष्णु भगवान् को कान्ति को चुराने वाले मेघ हैं।
मयूर, चातक और मेढक के शब्दों से युत मधुर शब्द वाले, आकाश को व्याप्त कर दिगन्त तक लटके हुये तथा पृथ्वी पर अधिक वृष्टि करने वाले मेघ ।
तीन या दो दिन तक पूर्वोक्त स्वरूप वाले मेघों से युत आकाश हो तो सुभिक्ष, आनन्दयुत मनुष्य और पृथ्वी पर अधिक दृष्टि होती है।
रूस, अल्प, वायु से प्रेरित, ऊँट, कौआ, मुर्दा, बानर या अन्य निन्दित जोवों (कुत्ता, बिल्ली, राक्षस आदि) की तरह कान्ति वाले और शब्दरहित मेघ अशुभ और अवृष्टि करने बाले होते हैं।
यदि मेघरहित आकाश में सूर्य के किरण तीक्ष्ण हों तथा रात्रि में निर्मल नक्षत्रों से युत आकाश, खिली हुई कुमुदिनियों से युत सरोवर की तरह हो तो सुन्दर वृष्टि होती है।
पूर्व दिशा में उत्पन्न मेपों से धान्य की उत्तम निष्पत्ति, आग्नेय कोण में उत्पन्न मेघों से अग्नि का भय, दक्षिण दिशा में उत्पन्न मेघों से धान्य का नाश, नैर्ऋत्य कोण में उत्पन्न मेथों से धान्य को आधी निष्पत्ति
उत्पत्र मेचों से कहीं-कहीं पर वायुयुत वृष्टि (सर्वत्र नहीं), उत्तर दिशा में उत्पन्न मेधों से पूर्ण वृष्टि और ईशान कोण में उत्पत्र मेघों से उत्तम धान्य होता है। दिशाओं के अनुसार बापु का भी इसी तरह फल समझना चाहिये।
रोहिणी योग के समय दिशाओं के अनुसार मेघों के फल (पूर्वोद्धवैः सस्यनिष्पत्ति- रित्यादि पद्योक्त फल) की तरह दिशाओं के अनुसार उल्कापात, विद्युत्, दिग्दांह, आकाश में शब्द, भूकम्प, पक्षी और वन-जन्तुओं के शब्द का फल कहना चाहिये।
पूर्णः स मासः सलिलस्य दाता सुतैरवृष्टिः परिकल्प्यमूनैः ॥२६॥ रोहिणी योग के दिन वृष्टि होने पर उत्तर आदि चारों दिशाओं में प्रदक्षिण क्रम से आषण आदि चार मासों का नाम अङ्कित करके चार पड़ों का स्थापन करे। जिस मास का महा जल से पूर्ण हो जाय, यह मास फल देने वाला, पड़े से बिलकुल जल निकल जाय तो अवृष्टि और घोड़ा जल हो तो अपनी बुद्धि से तारतम्य करके सृष्टि की कल्पना करनी चाहिये। जैसे आधे में आपा, चौथाई में चौथाई इत्यादि वृष्टि कहनी चाहिये ।
रोहियों योग के समय दृष्टि होने पर उत्तर आदि चार दिशाओं में प्रदक्षिण क्रम से उत्तर आदि दिशाओं में स्थिराना, देश और ब्राह्मण आदि चार वर्षों का नाम अङ्कित करके पूर्ववत् चार धड़ों का स्थापन करे। बाद में जिस दिशा का महा नष्ट हो जाप, उस दिख के राजा, देश और बगों का नाम, जिस दिशा के पड़ा से सब जाल बह जाय उस दिसा के राजा अदियों में उपद्रव; जिस दिशा के पड़ा में थोड़ा बल शेष रहे उस दिशा के राजा आदियों को मध्यम फल और जिस दिशा का पड़ा जल से पूर्ण हो जाय उस दिश के राजा आदियों को अति शुभ फल होड़ा है।
यदि दूर स्थित या समीप स्थित चन्द्रमा रोहिणी के दक्षिणगत होकर संयोग करे तो संसार को दुःखी करने वाला होता है।
यदि रोहिगों के दक्षिण में स्पर्श करते हुये उत्तर तरफ होकर इमा गमन करे तो सुन्दर वृष्टि और लोगों में अनेक प्रकार के उपद्रव होते हैं। पदि रोहिणी को स्पर्श नहीं करते हुये उत्तर तरफ होकर चन्द्रमा गगन करे तो सुन्दर दृष्टि और लोगों का शुभ करने बता देता है।
यदि रोहिणी शकट (छः तारा होने के कारण रोहिणी शकट कहते हैं) के मध्य स्थित होकर चन्द्रमा गमन करे तो आश्रयरहित, बच्चों के लिये भोजन माँगते हुये, सूर्य किरण से अत्यन्त उष्ण जल पीते हुये लोग (प्रजागण) अनिश्चित स्थान पर गमन करते 1
पहले चन्द्र का उदय होकर पश्चात् चन्द्र के पश्चिम दिशा में रोहिणी उदित होकर गमन करे तो लोगों में अनेक प्रकार के शुभ होते हैं तथा कामातुर स्रोगण पति के वश में हो जाती हैं।
जैसे प्रिया ली के पीछे कामी पुरुष गमन करता है, उसी तरह यदि रोहिणी के पीछे चन्द्र गमन करे तो काम के बाण से खेदित होकर मनुष्यगण स्त्री के यश में हो जाते हैं।
जिस वर्ष में रोहिणों के आग्नेय कोण में चन्द्रमा स्थित हो, उस वर्ष में बहुत उपद्रव, नैर्श्वत्य कोण में चन्द्रमा स्थित हो तो अति वृष्टि आदि इंतियों से पीड़ित होकर पान्य का नारा, वायव्य कोण में स्थित चन्द्र हो तो मध्यम धान्य और ईशान कोण में स्थित चन्द्र हो तो उस वर्ष धान्यों के मूल्य में अल्पता, सुन्दर वृष्टि भादि बहुत गुण होते हैं।
यदि चन्द्रमा रोहिणी की योगतारा को भेदित ( शृङ्ग के एक देश से स्पर्श) करे या अपने विम्ब से उसको आच्छादित करे तो भेदित करने से कठोर भय और छादित करने से खी के द्वारा राजा का मरण होता है।
यदि गो-प्रवेश (पश्चिम सन्न्या) समय में वन में आये हुये पशुओं में आगे बेल करता पशु हो तो उस वर्ष बहुत पृष्टि होती है। यदि शबल (कृष्य-चेत) पशु आगे हो हो मध्यम फल, उसमें कालापन ज्यादा हो तो वृष्टि, मदीयादा होती थोड़ी दृहि और विसी ही अति होती है।
मेष से ढके हुये आकाश में रोहिणी योग के समय यदि चन्द्र नहीं दिखाई दे तो उस वर्ष में अतिशय रोग का भय होता है तथा पृथ्वी बहुत धान्य और वृष्टि से युत होती है।
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