योगो यथानागत एव वाच्यः स धिष्ण्ययोगः करणे मयोक्तः । चन्द्रप्रमाणद्युतिवर्णमार्गेरुत्पातवातैश्च फलं निगद्यम् ॥
यह योग पञ्चसिद्धान्तिका में मैंने (वराह- मिहिर ने ) कह दिया है। चन्द्रविम्बप्रमाण, चन्द्र की कान्ति, चन्द्र का वर्ण, चन्द्र का मार्ग, अनेक तरह के उत्पात और वायु के द्वारा संसार का शु। शुभ कहना चाहिये ।
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