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बृहत्संहिता • अध्याय 24 • श्लोक 15
असितधननिरुद्धमेव वा चलिततडित्सुरचापचित्रितम् । द्विपमहिषकुलाकुलीकृतं वनमिव दावपरीतमम्बरम् ॥
बिजली, इन्द्रधनु और कृष्ण वर्ण के मेयों से युत होने के कारण विचित्र वर्ण का आकाश मानो दावाग्नि, हाथी और भैंसों से आकुलित वन को तरह रोहिणी योग के समय में शुभ होता है।
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