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बृहत्संहिता • अध्याय 24 • श्लोक 29
स्पृशत्रुदरयाति यदा शशाङ्कस्तदा सुवृष्टिर्वहुलोपसर्गा । असंस्पृशन्योगमुदकसमेतः करोति वृष्टिं विपुलां शिवछ ॥
यदि रोहिगों के दक्षिण में स्पर्श करते हुये उत्तर तरफ होकर इमा गमन करे तो सुन्दर वृष्टि और लोगों में अनेक प्रकार के उपद्रव होते हैं। पदि रोहिणी को स्पर्श नहीं करते हुये उत्तर तरफ होकर चन्द्रमा गगन करे तो सुन्दर दृष्टि और लोगों का शुभ करने बता देता है।
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