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बृहत्संहिता • अध्याय 24 • श्लोक 1
कनकशिलाबयविवरजतरुकुसुमासङ्गिमधुकरानुरुते । बहुविहगकलहसुरयुवतिगीतमन्द्रस्वनोपवने ॥
सुवर्ण-पाषाण के समुदाय में उत्पन्न वृक्षों के पुष्पों पर बैठे हुये भ्रमरों के शब्दों में संयुत, नाना प्रकार के पक्षियों के आलाप से मिश्रित
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