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बृहत्संहिता • अध्याय 24 • श्लोक 33
आग्नेय्यां दिशि चन्द्रमा यदि भवेत्तत्रोपसर्गो महान् नैर्ऋत्यां समुपद्रुतानि निधनं सस्यानि यान्तीतिभिः । प्राजेशानिलदिक्स्थिते हिमकरे सस्यस्य मध्यश्चयो याते स्थाणुदिशं गुणाः सुबहवः सस्यार्घवृष्ट्यादयः ॥
जिस वर्ष में रोहिणों के आग्नेय कोण में चन्द्रमा स्थित हो, उस वर्ष में बहुत उपद्रव, नैर्श्वत्य कोण में चन्द्रमा स्थित हो तो अति वृष्टि आदि इंतियों से पीड़ित होकर पान्य का नारा, वायव्य कोण में स्थित चन्द्र हो तो मध्यम धान्य और ईशान कोण में स्थित चन्द्र हो तो उस वर्ष धान्यों के मूल्य में अल्पता, सुन्दर वृष्टि भादि बहुत गुण होते हैं।
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