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बृहत्संहिता • अध्याय 24 • श्लोक 10
तत्रार्द्धमासाः वर्षानिमित्तं प्रहरैर्विकल्प्या दिवसास्तदंशैः । सव्येन गच्छन् शुभदः सदैव यस्मिन् प्रतिष्ठा बलवान्स वायुः ॥
वहाँ वर्षा के निमित्त प्रहर से पक्ष और प्रहरांश से दिन की कल्पना करनी चाहिये। जैसे रोहिणीगत चन्द्र के दिन सूर्योदय से लेकर अग्रिम सूर्योदय तक आठ प्रहरों में से प्रथम प्रहर से लेकर स्थापित पताका द्वारा वायु की परीक्षा करे। यदि दिन के प्रथम प्रहर में सुन्दर वायु चले तो ब्रावण कृष्ण में, द्वितीय प्रहर में चले तो श्रावण शुक्ल में, तृतीय प्रहर में वायु चले तो भाद्र कृष्ण में, चतुर्थ प्रहर में वायु चले तो भाद्र शुक्ल में, रात्रि के प्रथम प्रहर में वायु चले तो आश्विन कृष्ण में, द्वितीय प्रहर में वायु चले तो आश्विन शुक्ल में, तृतीय प्रहर में बायु चले तो कार्तिक कृष्ण में और चतुर्थ प्रहर में सुन्दर बायु चले तो कार्तिक शुक्ल में सुन्दर वृष्टि होती है। यदि सूर्योदय से आधे प्रहर तक सुन्दर वायु चले तो श्रावण कृष्णादि के साढ़े सात दिन, उसके आधे काल तक में सवा चार दिन इत्यादि वृष्टि कहनी चाहिये। कोई पक्ष की जगह मास का ग्रहण करते हैं।
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