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बृहत्संहिता • अध्याय 24 • श्लोक 17
तडिन्द्वैमक क्ष्यैर्बलाकाप्रदन्तैः स्रवद्वारिदानैश्चलत्प्रान्तहस्तैः । विचित्रेन्द्रचापध्वजोच्छ्रायशोभैस्तमालालिनीलैर्वृतं चाब्दनागैः ॥
बिजली रूप मध्यबन्धन (करधनी), हंसपंक्ति रूप आगे के दाँत, गिरते हुये जलरूप मद, चलते हुये अग्रभागरूप हाथ, विचित्र इन्द्रधनु के समान ऊँची ध्वजा वाले, तमाल वृक्ष और भ्रमर की तरह काले हाथों को तरह मेघों से व्याप्त आकाश रोहिणों के समय में शुभ होता है।
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