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बृहत्संहिता • अध्याय 24 • श्लोक 19
सशिखिचातकदर्दुरनिःस्वनैर्यदि विमिश्रितमन्द्रपटुस्वनाः । खमवतत्य दिगन्तविलम्बिनः सलिलदाः सलिलौघमुचः क्षितौ ॥
मयूर, चातक और मेढक के शब्दों से युत मधुर शब्द वाले, आकाश को व्याप्त कर दिगन्त तक लटके हुये तथा पृथ्वी पर अधिक वृष्टि करने वाले मेघ ।
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