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बृहत्संहिता • अध्याय 24 • श्लोक 20
निगदितरूपैर्जलधरजालेस्यहमवरुद्धं यहमथवाहः । यदि वियदेवं भवति सुभिक्षं मुदितजना च प्रचुरजला भूः ॥
तीन या दो दिन तक पूर्वोक्त स्वरूप वाले मेघों से युत आकाश हो तो सुभिक्ष, आनन्दयुत मनुष्य और पृथ्वी पर अधिक दृष्टि होती है।
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