अध्याय 6 — षष्ठम् अंक
अभिज्ञानशाकुन्तलम्
32 श्लोक • केवल अनुवाद
कोतवाल:--
हाँ, तब (फिर क्या हुआ) ?
पुरुष:--
एक दिन रोहू (रोहित) मछली मेरे द्वारा टुकड़े-टुकड़े की गयी (अर्थात् मैंने उसे काटा) । उसके पेट के भीतर रत्न से चमकती हुई इस अंगूठी को देखा बाद में मैं उसको बेचने के लिये (व्यापारी को) दिखाता हआ आदरणीय आप लोगों द्वारा पकड़ लिया गया हूँ । अब मुझे मारिये अथवा छोड़िए । यही इस (अंगूठी) के मिलने की कहानी है ।
कोतवाल:--
जानुक, कच्चे मांस की गन्ध वाला यह निःसन्देह ही गोह भक्षी मछली पकड़ने वाला (मल्लाह) है । इसका अंगूठी पाना (अर्थात् इसके अंगूठी पाने की कहानी) विचारणीय है । हम लोग राजदरबार (राजकुल) में ही चलते हैं ।
दोनों सिपाही:--
ठीक है । अरे गिरहकट (गांड काटनेवाले, चोर) चलो ।
(सभी घूमते हैं)
कोतवाल:--
सूचक, नगर के द्वार पर अप्रमादपूर्वक (अर्थात् सावधानी से) (तुम दोनो) इस (धीवर) की देखभाल करना, जब तक यह अंगूठी जिस प्रकार मिली है (वैसा) स्वामी से निवेदन कर और फिर (उनकी) आज्ञा को लेकर (बाहर) निकलता हूँ ।
दोनों (सिपाही):--
महाराज की कृपा प्राप्त करने के लिये श्रीमान् (भीतर) प्रवेश करें ।
( श्याल (कोतवाल) निकल जाता है )
प्रथम (सिपाही):--
जानुक, श्रीमान् (कोतवाल) जी विलम्ब कर रहे हैं ।
दूसरा (सिपाही):--
राजा लोग यथावसर मिलने योग्य होते हैं (अर्थात् राजा लोगों से अवसर देखकर ही मिला जाता है) ।
प्रथम सिपाही:--
जानुक, मेरे हाथ इसके बध के लिये पुष्पों की माला पहनाने हेतु फड़क रहे हैं । (पुरुष की ओर सङ्केत करता है) ।
[प्राचीन काल में जिसको प्राणदण्ड दिया जाता था, उसे न्यायालय से फांसी के स्थान तक लाल माला पहना कर ले जाया जाता था।]
पुरुष:--
आप लोगों के लिये अकारण (ही) (मुझे) मारने का विचार करना उचित नहीं है ।
द्वितीय सिपाही:--
(देखकर) ये हमारे स्वामी हाथ में पत्र लिये हुये राजा के आदेश को लेकर इधर मुख किये हुये दिखायी पड़ रहे हैं । (अब) तु गिद्ध का भोजन (बलि) होगा अथवा कुत्तों का मुंह देखेगा ।
(प्रवेश कर) कोतवाल:--
सूचक, जाल से (मछली पकड़कर) आजीविका चलाने वाला यह (मल्लाह) छोड़ दिया जाए । इसकी अँगूठी मिलने की (प्राप्ति की) बात ठीक है ।
सूचक:--
जैसा श्रीमान् कहते हैं (वैसा ही करता हूँ) ।
द्वितीय (सिपाही):--
यह यमराज के घर जाकर लोट आया । (पुरुष को बन्धन से मुक्त कर देता है) ।
पुरुष:--
(कोतवाल को प्रणाम कर) स्वामी, मेरी आजीविका कैसी है ?
कोतवाल:--
महाराज के द्वारा अँगूठी के मूल्य के बराबर यह पुरस्कार (प्रसाद) भी दिलाया गया है । (पुरुष को धन देता है) ।
पुरुष:--
(प्रणामपूर्वक लेकर) स्वामी, मैं अनुगरहीत हूँ ।
सुचक:--
यह अनुग्रह ही है कि शूली से उतार कर हाथी के कन्धे पर बैठा दिया गया ।
जानुक:--
श्रीमान् , पुरस्कार (देना यह) ज्ञापित करता है कि अँगूठी से महाराज का अत्यधिक प्रम होना चाहिये (अर्थात् पुरस्कार देने से यह प्रतीत होता है कि महाराज को वह अँगूठी अत्यन्त प्रिय है) ।
कोतवाल:--
मैं अनुमान करता हूँ कि उस (अँगूठी) में (जड़ा गया) बहुमूल्य रत्न महाराज को प्रिय नहीं है । (किन्तु) उसको देखने से महाराज का (कोई) प्रिय व्यक्ति (उनको) याद आ गया । (क्योकि) वे स्वभावतः गम्भीर होते हुये भी थोड़ी देर के लिये अश्रुपूरितनयन वाले (आँसू से युक्त नेत्र वाले) हो गये (अर्थात् उनकी आंखो में आंसू भर गये) ।
सुचक:--
तब श्रीमान् (आप) के द्वारा महाराज की सेवा कर दी गयी ।
जानुक:--
यह कहो कि इस धीवरराज (मल्लाहों के स्वामी) के लिये (आप द्वारा महाराज की सेवा की गयी) । (पुरुष को ईष्यापूर्वक देखता है) ।
पुरुष:--
स्वामी, इसमें से आधा आप लोगों के (पूजा के लिये) पुष्पों का मूल्य हो (अर्थात् इसमे से आधा आप लोग ले लें) ।
जानुक:--
इतना ठीक है ।
कोतवाल:--
धीवर, अब तुम मेरे अत्यन्त प्रिय मित्र हो गये । हम लोगों की प्रथम मित्रता मदिरा को साक्षी बनाकर होनी चाहिये । तो हम लोग शराब-विक्रेता की दूकान पर ही चलते हैं ।
(सभी निकल जाते हैं)
॥ प्रवेशक समाप्त ॥
( तत्पश्चात् विमान से सानुमती नामक अप्सरा प्रवेश करती है )
सानुमती:--
जब तक सज्जन लोगों के स्नान का समय है तब तक अप्सरातीर्थ पर बारीबारी से वहाँ उपस्थित रहने का जो नियम है, वह मैंने पूरा कर लिया है । अब इस राजर्षि (दुष्यन्त) का वृत्तान्त (समाचार) को मैं (स्वयं) प्रत्यक्ष करूंगी (अर्थात् प्रत्यक्ष रूप से देखूंगी) । मेनका के साथ सम्बन्ध होने के कारण शकुन्तला मेरे शरीर के समान है । उस (मेनका) के द्वारा (अपनी) पुत्री (शकुन्तला) के लिये (कुछ करने हेतु) मैं पहले से ही कह दी गयी हूँ । (चारो ओर देखकर) क्या कारण है कि (वसन्त) ऋतु के उत्सव के अवसर पर भी राजकुल में उत्सव का प्रारम्भ नहीं दिखायी पड़ रहा है । मुझे ध्यान-शक्ति (प्रणिधान) से सब कुछ जान लेने की शक्ति है किन्तु (अपनी) सखी (मेनका) के अनुरोध का सम्मान मुझे करना ही चाहिये । अच्छा, मैं अन्तर्धान होने की विद्या (तिरस्करिणी) के द्वारा अदृश्य होकर इन दोनों उद्यानपालिकाओं के समीप में रहकर (दुष्यन्त का समाचार) जान जाऊंगी । (अभिनयपूर्वक उतरकर खड़ी हो जाती है) ।
(तत्पश्चात् अम्रमञ्जरी को देखती हुई दासी और उसके पीछे दूसरी दासी प्रवेश करती है)
पहली:--
कुछ लाल-हरे और श्वेत वर्ण वाले, वसन्त (चैत्र) मास के वास्तविक जीवन भूत हे आम के बौर, तुम देख लिये गये हो (अर्थात् तुम मुझे आज दिखायी दिये हो) । हे (वसन्त) ऋतु के मङ्गलस्वरूप, मैं तुमको प्रसन्न (प्रणाम) कर रही हूँ ।
विदूषक:--
तो रुकिये । इस काठ के दण्ड से कामदेव के बाण को नष्ट कर देता हूँ । (काठ के डण्डे को उठाकर आम्र-मञ्जरी को गिराना चाहता है )
राजा:--
(मुस्कराहट के साथ) अच्छा, (तुम्हारा) ब्रह्मतेज देख लिया गया । हे मित्र, कहाँ बैठकर मैं अपनी प्रिय (शकुन्तला) का कुछ-कुछ अनुकरण करने वाली लताओं पर (अर्थात् लताओं `को देखकर) अपनी दृष्टि को आनन्दित करुँ (बहलाऊँ) ।
विदूषक:--
आपने समीपवर्ती सेविका चतुरिका को आदेश किया है कि "माधवी लता के कुञ्च (मण्डप) में इस समय को बिताऊंगा । वहाँ मेरे अपने हाथ द्वारा चित्रपट पर बनाये गये मान्य शकुन्तला के चित्र को लाओ" ।
राजा:--
ऐसा मन बहलाने का स्थान है, तो उसी मार्ग को बताओ ।
विदूषक:--
आप इधर से, इधर से (आइये) ।
(दोनो चारो ओर घूमते हैं । सानुमती उनके पीछे-पीरे जाती है)
विदूषक:--
यह मणिमय शिलापट्ट से युक्त माधवीकुञ् (पुष्पों के) उपहारो से रमणीय होने के कारण निःसन्देह मानो स्वागतपूर्वक हम दोनों को अमंत्रित करा रहा है (अर्थात् हम दोनों को बुला रहा है) तो प्रवेश करके आप बैठिये ।
(दोनों प्रवेश कर बैठ जाते हैं)
सानुमती:--
तब तक लता का आश्रय (ओट) लेकर सखी (शकुन्तला) के चित्र को देखती हूँ । तत्पश्चात् इस (शकुन्तला) के पति (दुष्यन्त) के बहुमुखी (विविध प्रकार से प्रकट किये हुये) अनुराग को मैं उससे (शकुन्तला से) कहूंगी । (वैसा कर अर्थात् लता में छिपकर खड़ी हो जाती है )
राजा:--
हे मित्र, अब शकुन्तला से सम्बद्ध पहले के सभी वृत्तान्त (घटना) को याद कर रहा हूँ । आप को मैंने (उसी समय) कहा (बताया) भी था । वह आप (उस शकुन्तला के) परित्याग के समय मेरे पास नहीं थे । (किन्तु) पहले भी आप के द्वारा उस (शकुन्तला) का नाम नहीं लिया गया (अर्थात् आप ने याद नहीं दिलाया) । क्या तुम भी मेरी तरह भूल गये थे ?
विदूषक:--
मैं नहीं भूलता । किन्तु सब कुछ कहकर अन्त में फिर आप ने कहा था कि - "यह सब हंसी की बात है, सत्य नही" । मिट्टी के लोदे के समान मन्द बुद्धि वाले मैंने भी उसी प्रकार (हंसी में कहा गया कथन) ही समझ लिया । अथवा भावी (होनवार) बलवान् होती है ।
सानुमती:-- यह ऐसा (ही है) ।
राजा:--
(ध्यान करके) हे मित्र, मुझको बचाओ ।
विदूषक:--
अरे, यह क्या ? आप के विषय में निश्चय ही यह अनुचित है । सज्जन व्यक्ति कभी भी शोक के वशीभूत नहीं होते हैं । निश्चय ही ओंधी में भी पर्वत नहीं कांपते (अर्थात् नहीं हिलते - अडिग रहते हैं) ।
राजा:--
हे मित्र, परित्याग से व्याकुल प्रियतम (शकुन्तला) की (तत्कालीन) दशा को याद कर मैं अत्यधिक असहाय (अधीर) हो गया हूँ । क्योकि वह यहाँ से (अर्थात् मेरे द्वारा) अस्वीकार हो जाने के कारण अपने बान्धवो के पीछ-पीछे जाने के लिये प्रवृत्त हुयी (अर्थात् अपने साथ आये हुये व्यक्तियों के पीछे-पीछे चलने लगी) । गुरु (पिता) के समान गुरुशिष्य (शार्खगरव) के "(यहीं) रुको" इस प्रकार जोर से (डांटकर) कहने पर खड़ी हो गयी (रुक गयी) । आंसुओं के प्रवाह से मलिन दृष्टि को फिर मुझ कठोर (क्रूर) पर जो डाली, वह (सारा दृश्य) विषयुक्त (विष से बुझे हुए) बाण की भाँती मुझको जला रहा है (अर्थात् दुःखित कर रहा है) ।
सानुमती:--
तब शकुन्तला के परित्याग का दुख तुम्हारे द्वारा सब प्रकार से धो दिया (दूर कर दिया) गया है ।
(प्रवेश कर) चतुरिका:--
जय हो, स्वामी की जय हो (चित्र में रंग भरने के लिये) कूुचियों की पेटी (वर्तिकाकरण्डक) को लेकर मैं इधर की ओर आ रही थी ।
राजा:--
फिर क्या हुआ ?
चतुरिका:--
यह (कूचियो की पेटी) मेरे हाथ से तरलिका जिनका अनुगमन कर रही थी ऐसी (अर्थात् तरलिका के साथ वहां उपस्थित) महारानी वसुमती के द्वारा "मैं ही महाराज के पास (इसे) पहुंचाऊंगी" - ऐसा कहकर बलपूर्वक ले ली गयी ।
विदूषक:--
भाग्य से तुम छूट गयी हो ।
चतुरिका:--
जब तक (वृक्ष की) शाखा (डाली) में फंसे महारानी के दुपट्टे को तरलिका छुड़ाने लगी तब तक मेरे द्वारा अपना शरीर बचा लिया गया (अर्थात् मैं अपने को बचा कर भाग आयी) ।
राजा:--
हे मित्र, महारानी आने वाली हैं और अत्यधिक मान से गर्वित हैं । आप इस चित्र की रक्षा करें।
विदूषक:--
यह कहो कि अपने को (अर्थात् मुझे) बचाओ । (चित्रपट को लेकर और उठकर) यदि अन्तःपुर के कूट-जाल से मुक्त हों तब मुझको "मेघप्रतिच्छन्द" नामक भवन में पुकारना । (तेजी से पैर बढ़ाता हुआ निकल जाता है)
सानुमती:--
अन्य (शकुन्तला में) संलग्र हृदय वाला यह (राजा) इस समय (वसुमती के प्रति) शिथिल (स्वल्प) प्रेम युक्त (होने पर भी) (उसके साथ हुये) प्रथम प्रणय का ध्यान रखता है ?
(हाथ में पत्र ली हुई प्रवेश कर)
प्रतीहारी:--
जय हो, महाराज की जय हो ।
राजा:--
वेत्रवती, तुम्हारे द्वारा (मार्ग) के बीच में महारानी (तो) नहीं देखी गयी हैं (अर्थात् तुमने महारानी वसुमती को तो नहीं देखा है) ।
परतीहारी:--
ओर क्या (अर्थात् हाँ देखा था) ! मुझे हाथ में पत्र लिये हुये देखकर लौट गयीं ।
राजा:--
कार्यों को जानने वाली (महारानी वसुमती) मेरे कार्यों में विघ्न नहीं डालती हैं ।
प्रतीहारी:--
महाराज ! मन्त्री निवेदन कर रहे हैं कि (कर रूप में प्राप्त) धन-राशि की गणना (गिनने) की अधिकता के कारण नगर-वासियों नागरिको का (केवल) एक ही कार्य देखा गया है । पत्र पर चढ़ाए गये (अङ्कित) उस (कार्य) को महाराज (आप) देख लें ।
राजा:--
इधर (मुझको) पत्र दिखाओ ।
(प्रतिहारी पास ले जाती है)
राजा:--
(पढ़कर) (यह) क्या ! समुद्र के द्वारा व्यापार करने वाला, व्यापारियों का प्रधान (सार्थवाह) धनमित्र नौका-दुर्घटना में मर गया । ओर वह बेचारा निःसन्तान था । "उसकी धनराशि राजा के पास जानी चाहिये" यह मंत्री के द्वारा लिखा गया है । सन्तानहीनता निश्चय ही कष्टदायक है । वेत्रवती, अत्यधिक धन होने के कारण उस आदरणीय (व्यापारी) को बहुत पत्नियों वाला होना चाहिये । पता लगाया जाए - शायद उसकी पत्नियों मे कोई गर्भिणी हो ।
प्रतीहारी:--
महाराज, सुना जा रहा है कि अयोध्या के सेठ की पुत्री जिसका पुंसवन संस्कार अभी हुआ है, इसकी पत्नी है ।
राजा:--
तो गर्भ में स्थित सन्तान पिता के धन का अधिकारी है । जाओ । मंत्री से इस प्रकार कह दो ।
प्रतीहारी:--
महाराज जो आज्ञा देते हैं । (चल देती है)
राजा:--
जरा इधर आओ ।
प्रतीहारी:--
यह मैं हूँ ।
राजा:--
इससे क्या कि सन्तान है अथवा नहीं है । प्रजाजन (अपने) जिस-जिस स्नेही सम्बन्धी बन्धु से (मृत्यु के कारण) वियुक्त हो जाते हैं, पापकर्म के अतिरिक्त (यह) दुष्यन्त (अर्थात् मैं) उनका वह-वह (सम्बन्धी) है, ऐसी घोषणा कर दी जाए।