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अध्याय 6 — षष्ठम् अंक

अभिज्ञानशाकुन्तलम्
32 श्लोक • केवल अनुवाद
(तत्पश्चात्‌ नगर-रक्षाधिकारी राजा का साला और उसके पीछे बंधे हुए पुरुष को लेकर दो रक्षक (सिपाही) प्रवेश करते हैं ।) दोनों सिपाही:-- (पीट कर) अरे चोर, बताओ मणिजट्टित और जिस पर नाम खुदा हुञा है ऐसी यह राजा की अँगूठी तुमने कहाँ पायी ? पुरुष:-- (भय के अभिनय के साथ) आदरणीय आप लोग (मुझपर) प्रसन्न हों । मैं इस प्रकार का काम (अर्थात्‌ चोरी) करने वाला नहीं हूँ । प्रथम (सिपाही):-- क्या सुयोग्य ब्राह्मण (हो) - ऐसा समझकर राजा ने (तुम्हे यह) दान दिया है ? पुरुष:-- अब सुनिये । मैं शक्रावतार (नामक तीर्थ) में रहने वाला मल्लाह हूँ । द्वितीय (सिपाही):-- अरे चोर, क्या हम लोगों ने तुम्हारी जाति पूछी है ? कोतवाल:-- सूचक, इसे क्रमशः सारी बात कहने दो । इसको बीच में मत टोको । दोनों (सिपाही):-- जो श्रीमान्‌ (आवुत्त) आज्ञा देते हैं । (तदनुसार अपनी बात) कहो । पुरुष:-- मैं जाल-कंटा (कांटा-उदगाल) इत्यादि मछली पकड़ने के साधनों (उपायो) से (अपने) परिवार का पालन पोषण करता हूँ । कोतवाल (हंसकर):-- तो (यह तुम्हारी बड़ी) पवित्र आजीविका है । पुरुष:-- निन्दित (भी) जो काम स्वाभाविक हो (अर्थात्‌ वंशपरम्परा से चला आ रहा हो), उसको निश्चय ही नहीं छोडना चाहिये । (यज्ञों में) पशु हत्या जैसे कर्म के कारण कठोर (हृदय वाला) वेदपाठी (ब्राह्मण) वस्तुतः कृपा (दया) भाव से कोमल (ही होता है, अर्थात्‌ कहा जाता है) ।
कोतवाल:-- हाँ, तब (फिर क्या हुआ) ? पुरुष:-- एक दिन रोहू (रोहित) मछली मेरे द्वारा टुकड़े-टुकड़े की गयी (अर्थात्‌ मैंने उसे काटा) । उसके पेट के भीतर रत्न से चमकती हुई इस अंगूठी को देखा बाद में मैं उसको बेचने के लिये (व्यापारी को) दिखाता हआ आदरणीय आप लोगों द्वारा पकड़ लिया गया हूँ । अब मुझे मारिये अथवा छोड़िए । यही इस (अंगूठी) के मिलने की कहानी है । कोतवाल:-- जानुक, कच्चे मांस की गन्ध वाला यह निःसन्देह ही गोह भक्षी मछली पकड़ने वाला (मल्लाह) है । इसका अंगूठी पाना (अर्थात्‌ इसके अंगूठी पाने की कहानी) विचारणीय है । हम लोग राजदरबार (राजकुल) में ही चलते हैं । दोनों सिपाही:-- ठीक है । अरे गिरहकट (गांड काटनेवाले, चोर) चलो । (सभी घूमते हैं) कोतवाल:-- सूचक, नगर के द्वार पर अप्रमादपूर्वक (अर्थात्‌ सावधानी से) (तुम दोनो) इस (धीवर) की देखभाल करना, जब तक यह अंगूठी जिस प्रकार मिली है (वैसा) स्वामी से निवेदन कर और फिर (उनकी) आज्ञा को लेकर (बाहर) निकलता हूँ । दोनों (सिपाही):-- महाराज की कृपा प्राप्त करने के लिये श्रीमान्‌ (भीतर) प्रवेश करें । ( श्याल (कोतवाल) निकल जाता है ) प्रथम (सिपाही):-- जानुक, श्रीमान्‌ (कोतवाल) जी विलम्ब कर रहे हैं । दूसरा (सिपाही):-- राजा लोग यथावसर मिलने योग्य होते हैं (अर्थात्‌ राजा लोगों से अवसर देखकर ही मिला जाता है) । प्रथम सिपाही:-- जानुक, मेरे हाथ इसके बध के लिये पुष्पों की माला पहनाने हेतु फड़क रहे हैं । (पुरुष की ओर सङ्केत करता है) । [प्राचीन काल में जिसको प्राणदण्ड दिया जाता था, उसे न्यायालय से फांसी के स्थान तक लाल माला पहना कर ले जाया जाता था।] पुरुष:-- आप लोगों के लिये अकारण (ही) (मुझे) मारने का विचार करना उचित नहीं है । द्वितीय सिपाही:-- (देखकर) ये हमारे स्वामी हाथ में पत्र लिये हुये राजा के आदेश को लेकर इधर मुख किये हुये दिखायी पड़ रहे हैं । (अब) तु गिद्ध का भोजन (बलि) होगा अथवा कुत्तों का मुंह देखेगा । (प्रवेश कर) कोतवाल:-- सूचक, जाल से (मछली पकड़कर) आजीविका चलाने वाला यह (मल्लाह) छोड़ दिया जाए । इसकी अँगूठी मिलने की (प्राप्ति की) बात ठीक है । सूचक:-- जैसा श्रीमान्‌ कहते हैं (वैसा ही करता हूँ) । द्वितीय (सिपाही):-- यह यमराज के घर जाकर लोट आया । (पुरुष को बन्धन से मुक्त कर देता है) । पुरुष:-- (कोतवाल को प्रणाम कर) स्वामी, मेरी आजीविका कैसी है ? कोतवाल:-- महाराज के द्वारा अँगूठी के मूल्य के बराबर यह पुरस्कार (प्रसाद) भी दिलाया गया है । (पुरुष को धन देता है) । पुरुष:-- (प्रणामपूर्वक लेकर) स्वामी, मैं अनुगरहीत हूँ । सुचक:-- यह अनुग्रह ही है कि शूली से उतार कर हाथी के कन्धे पर बैठा दिया गया । जानुक:-- श्रीमान्‌ , पुरस्कार (देना यह) ज्ञापित करता है कि अँगूठी से महाराज का अत्यधिक प्रम होना चाहिये (अर्थात्‌ पुरस्कार देने से यह प्रतीत होता है कि महाराज को वह अँगूठी अत्यन्त प्रिय है) । कोतवाल:-- मैं अनुमान करता हूँ कि उस (अँगूठी) में (जड़ा गया) बहुमूल्य रत्न महाराज को प्रिय नहीं है । (किन्तु) उसको देखने से महाराज का (कोई) प्रिय व्यक्ति (उनको) याद आ गया । (क्योकि) वे स्वभावतः गम्भीर होते हुये भी थोड़ी देर के लिये अश्रुपूरितनयन वाले (आँसू से युक्त नेत्र वाले) हो गये (अर्थात्‌ उनकी आंखो में आंसू भर गये) । सुचक:-- तब श्रीमान्‌ (आप) के द्वारा महाराज की सेवा कर दी गयी । जानुक:-- यह कहो कि इस धीवरराज (मल्लाहों के स्वामी) के लिये (आप द्वारा महाराज की सेवा की गयी) । (पुरुष को ईष्यापूर्वक देखता है) । पुरुष:-- स्वामी, इसमें से आधा आप लोगों के (पूजा के लिये) पुष्पों का मूल्य हो (अर्थात्‌ इसमे से आधा आप लोग ले लें) । जानुक:-- इतना ठीक है । कोतवाल:-- धीवर, अब तुम मेरे अत्यन्त प्रिय मित्र हो गये । हम लोगों की प्रथम मित्रता मदिरा को साक्षी बनाकर होनी चाहिये । तो हम लोग शराब-विक्रेता की दूकान पर ही चलते हैं । (सभी निकल जाते हैं) ॥ प्रवेशक समाप्त ॥ ( तत्पश्चात्‌ विमान से सानुमती नामक अप्सरा प्रवेश करती है ) सानुमती:-- जब तक सज्जन लोगों के स्नान का समय है तब तक अप्सरातीर्थ पर बारीबारी से वहाँ उपस्थित रहने का जो नियम है, वह मैंने पूरा कर लिया है । अब इस राजर्षि (दुष्यन्त) का वृत्तान्त (समाचार) को मैं (स्वयं) प्रत्यक्ष करूंगी (अर्थात्‌ प्रत्यक्ष रूप से देखूंगी) । मेनका के साथ सम्बन्ध होने के कारण शकुन्तला मेरे शरीर के समान है । उस (मेनका) के द्वारा (अपनी) पुत्री (शकुन्तला) के लिये (कुछ करने हेतु) मैं पहले से ही कह दी गयी हूँ । (चारो ओर देखकर) क्या कारण है कि (वसन्त) ऋतु के उत्सव के अवसर पर भी राजकुल में उत्सव का प्रारम्भ नहीं दिखायी पड़ रहा है । मुझे ध्यान-शक्ति (प्रणिधान) से सब कुछ जान लेने की शक्ति है किन्तु (अपनी) सखी (मेनका) के अनुरोध का सम्मान मुझे करना ही चाहिये । अच्छा, मैं अन्तर्धान होने की विद्या (तिरस्करिणी) के द्वारा अदृश्य होकर इन दोनों उद्यानपालिकाओं के समीप में रहकर (दुष्यन्त का समाचार) जान जाऊंगी । (अभिनयपूर्वक उतरकर खड़ी हो जाती है) । (तत्पश्चात्‌ अम्रमञ्जरी को देखती हुई दासी और उसके पीछे दूसरी दासी प्रवेश करती है) पहली:-- कुछ लाल-हरे और श्वेत वर्ण वाले, वसन्त (चैत्र) मास के वास्तविक जीवन भूत हे आम के बौर, तुम देख लिये गये हो (अर्थात्‌ तुम मुझे आज दिखायी दिये हो) । हे (वसन्त) ऋतु के मङ्गलस्वरूप, मैं तुमको प्रसन्न (प्रणाम) कर रही हूँ ।
दूसरी:-- परिभृतिका, तुम अकेली क्या मंत्रणा कर रही हो ( अर्थात्‌ क्या गुनगुना रही हो ) ? पहली:-- मधुकरिका, परभृतिका (कोयल) आम की कली को देखकर मतवाली हो जाती है । ( मैं परभृतिका भी मतवाली हो रही हूँ ) । दूसरी:-- (प्रसन्नतापूर्वक शीघ्रता से समीप जाकर) क्या वसन्त का महीना आ गया ? पहली:-- मधुकरिका, अब तुम्हारे मदभरे (मादक) विलासों (विभ्रम) और गीतों का यह (सुहावना) समय (आ गया) है । दूसरी:-- सखी, मुझे सहारा दो, जब तक मैं अगले पैर पर खडी होकर आप्रमञ्जरी को लेकर (तोड़कर) कामदेव की अर्चना करती हूँ । पहली:-- यदि मुझे भी पूजा के फल का आधा भाग मिले, तो मैं एसा करूंगी । दूसरी:-- (तुम्हारे) न कहने पर भी यह होता (अर्थात्‌ बिना कहे भी पूजा का आधा फल तुम्हें मिल जाता) । क्योकि हम दोनों के प्राण एक ही हैं, (केवल) शरीर दो हैं । (सखी का सहारा लेकर-खड़ी हुयी आम का बौर तोडती है) । ओह, अविकसित (बिना खिली हुयी) भी आम की मञ्जरी, उण्ठल (बन्धन) के टूटने पर सुगन्ध युक्त हो रही है (अर्थात्‌ सुगन्ध फैला रही है) । (दोनों हाथों को कपोताकार जोड़कर) हे आम्रमञ्जरी ! तुमको मैं धनुर्धारी कामदेव को समर्पित करती हूँ । तुम पथिकजनों (प्रवासियों) की पत्नियों को लक्ष्य बनाने वाले और (कामदेव के) पाचों (बाणो) में सर्वश्रेष्ठ बाण होवो । (आम्रमञ्जरी को फैंकती हैं) ।
(पर्दा को हटाकर प्रवेश कर क्रोधपूर्वक) कञ्चुकी:-- अरी, मूर्ख ऐसा मत करो । महाराज द्वारा वसन्तोत्सव मना कर दिये जाने पर (भी) तुम आम की कली को तोड़ना क्यो प्रारम्भ कर रही हो ? दोनो:-- (डरी हुयी) आर्य, प्रसन्न होइये, हम दोनों वह बात नहीं जानती थीं (कि वसन्तोत्सव का निषेध किया गया है) । कञ्चुकी:-- क्या तुम दोनों ने यह नहीं सुना है कि वसन्त में फूलने वाले (वासन्तिक) वृक्षों के द्वारा और उन पर आश्रय लेने वाले (रहने वाले) पक्षियों के द्वारा (भी) महाराज की आज्ञा पालन किया गया है । क्योकि बहुत दिनों से निकली हुयी भी आम की कली अपने पराग को नहीं धारण कर रही है । कुरबक नामक पुष्प, जो कि (खिलने के लिये) तैयार हैं, वह (भी) कली की दशा में (ही) रह गया है । शिशिर (ऋतु) के बीत जाने पर भी नर-कोयलों की कूक (आवाज) (उनके) (गलो) मे (ही) रुकी है । मेरा (अनुमान) है कि कामदेव भी भयभीत होकर (अपने) तरकस से आधे खींचे हुए (निकाले हुए) बाण को रोक रहा है (अर्थात्‌ तरकस में ही रख रहा है) ।
दोनों:-- (इसमे कोई) संदेह नहीं है । राजर्षि (दुष्यन्त) अत्यन्त प्रभावशाली हैं । पहली:-- आर्य, कुछ दिनों पहले राजा के साले (राष्ट्रीय) मित्रावसु के द्वारा हम दोनों महारानी के चरणों में (महारानी की सेवा में) भेज दी गयी थीं । इस प्रकार हम दोनों को (इस) उद्यान (प्रमदवन) की सुरक्षा का काम सोंपा गया है । इसलिये (यहां) नवागन्तुक होने के कारण हम दोनों ने पहले यह समाचार नहीं सुना है । कञ्चुकी- ठीक है, तुम दोनों फिर ऐसा काम मत करना । दोनों:-- आर्य, हम दोनों को जिज्ञासा (है) । यदि इस जन (अर्थात्‌ हम दोनों) द्वारा सुनने योग्य (हो, तो) आर्य बताएं कि किस कारण से स्वामी ने वसन्तोत्सव रोक दिया है ? सानुमती:-- मनुष्य उत्सव के प्रेमी होते हैं । (इसलिये वसन्तोत्सव को रोकने मे कोई बड़ा कारण होना चाहये । कञ्चुकी:-- यह बात सर्वत्र फैल चुकी है तो क्यों न बता दूं | क्या शकुन्तला के परित्याग (अस्वीकार करने) के कारण होने वाला लोकापवाद आप लोगों के कर्णद्वार तक नहीं पहुंचा है (अर्थात्‌ आप लोगों ने नहीं सुना है) । दोनों:-- हम लोगों ने (नगर-रक्षाधिकारी) राजा के साले के मुख से अँगूठी देखने तक की बात सुनी है । कञ्चुकी:-- तब तो थोड़ा ही कहना (शेष) है । जब से अपनी अँगूठी को देखने से महाराज को यह बात याद आयी कि सचमुच सुश्री शकुन्तला एकान्त में मेरे द्वारा पहले विवाहित है (पर) अज्ञान के कारण उसका परित्याग कर दिया है तब से ही महाराज पश्चाताप में पड़े हुए हैं । क्योकि (वे राजा दुष्यन्त सम्प्रति) मनोहर वस्तुओं से द्वेष (घृणा) करते हैं (अर्थात्‌ रमणीय वस्तुओं को देखना पसन्द नहीं करते हैं) । पहले की भाँति प्रजाओं द्वारा प्रतिदिन सेवित नहीं होते (अर्थात्‌ प्रजाजनों मन्त्रियों आदि से पहले की भाँति नही मिलते) । जागते हुये ही बिस्तर के किनारो पर करवट बदलते-बदलते रातों को बिताते हैं । जब शिष्टता के कारण अन्तःपुर (रनिवास) की रानियों को उचित उत्तर देते हैं तब नाम लेने में भूल हो जाने पर (अर्थात्‌ उस रानी के नाम के स्थान पर शकुन्तला का नाम लेने पर) बहुत देर तक लज्जा वश व्याकुल हो जाते हैं ।
सानुमती:-- (यह समाचार) मेरे लिये प्रिय है । कञ्चुकी:-- इसी महान्‌ मानसिक ग्लानि के कारण उत्सव रोक दिया गया है । दोनों:-- (ऐसा करना) ठीक ही है । (नेपथ्य में) आइये, आप (इधर से) आईये । कञ्चुकी:-- (कान लगाकर) अरे, महाराज इधर ही आ रहे हैं । अपना काम करो (अर्थात्‌ अपने काम में लग जाओ) । दोनों:-- ठीक है । (दोनों निकल जाती हैं) । (तदनन्तर पश्चताप के अनुरूप वेश वाले राजा, विदूषक और प्रतीहारी प्रवेश करते हैं) कञ्चुकी:-- (राजा को देखकर) ओह, विशिष्ट (सुन्दर) आकृति वालो का सौन्दर्य सभी अवस्थाओं में विद्यमान रहता है अर्थात्‌ सुन्दर आकृति वाले लोग सभी अवस्थाओं में सुन्दर लगते हैं । इस प्रकार व्याकुल होते हुये भी महाराज देखने में प्रिय (मनोहर) हैं । क्योकि विशेषरूप से अलङ्कार (आभूषण) पहनने की विधि का परित्याग किये हुये, बायीं कलायी में एक स्वर्णनिर्मित कङ्गन (कट्कण) को धारण किये हुये, (उष्ण) श्वासो (सासो) से अत्यधिक लाल अधर (निचले ओट) वाले और चिन्ता से (रात-रात भर) जागने के कारण अत्यधिक लाल नेत्रों वाले (महाराज दुष्यन्त), कसौटी (शाण) पर घिसे गये महामणि (बहुमूल्य | रत्न) की भाँति कृश (दुर्बल) होते हुये भी अपनी तेजस्विता (तेज के गुण) के कारण (कृश) नही दिखलायी पड़ रहे हैं ।
सानुमती:-- (राजा को देखकर) परित्याग के द्वारा अपमानित हुई भी शकुन्तला इस (राजा दुष्यन्त) के लिये दुःखित रहती है, यह ठीक ही है । राजा:-- (ध्यान-मग्न धीरे-धीरे चारो ओर घूमकर) पहले मृगनयनी प्रिय (शकुन्तला) के द्वारा जगाया जाता हुआ (याद दिलाया जाता हुआ) भी सोया हुआ (विस्मृतिग्रस्त) यह अभागा हृदय अब पश्चाताप दुःख (भोगने) के लिये जाग गया (होश में आया) है ।
सानुमती:-- उस बेचारी (शकुन्तला) के भाग्य ही ऐसे हैं । विदूषक:-- (एक ओर मुंह करके) यह फिर शकुन्तला के रोग से आक्रान्त (ग्रस्त) हो गये । न जाने कैसे इनकी चिकित्सा होगी ? कञ्चुकी:-- (समीप में जाकर) जय हो, महाराज की जय हो । महाराज प्रमदवन के स्थान (मेरे द्वारा) भली-भाँति देख लिये गये हैं । महाराज, (अब आप) इच्छानुसार विनोदस्थानों पर बैठिए । राजा:-- वेत्रवति, मेरे आदेशानुसार मन्त्री आर्य पिशुन से कहो कि आज देर से (सोकर) उठने के कारण मेरा धर्मासन (न्यायासन) पर बैठना सम्भव नहीं है । आर्य (आप) के द्वारा जो नागरिको का कार्य देख लिया गया हो, उसे पत्र पर चढ़ाकर (मेरे पास) भेज दें । प्रतिहारी:-- जो महाराज आज्ञा देते हैं । (निकल जाता है) । राजा:-- वातायन, तुम भी अपना कार्य (नियोग) पूरा (अशुन्य) करो । कञ्चुकी:-- जो आप की आज्ञा । (निकल जाता है) । विदूषक:-- आप के द्वारा (यह स्थान) एकान्त (निर्जन) कर दिया गया । अब शीत और धूप से रहित इस रमणीय प्रमदवन के प्रदेश में अपना मनोरंजन कीजिये । राजा:-- हे मित्र, जो कहा जाता है कि विपत्तियाँ (अनर्थ) छिद्र (विपत्ति) पर ही टूट पड़ती है, वह बिल्कुल सत्य (अव्यभिचारी) वचन है । क्योकि हे मित्र, मुनि (कण्व) की पुत्री (शकुन्तला) के प्रति प्रणय (प्रेम) के स्मरण के अज्ञान (मोह) के द्वारा यह मन मुक्त कर दिया गया है, और प्रहार करने वाले कामदेव के द्वारा धनुष पर आम्र-मञ्जरी रूपी बाण भी चढ़ा लिया गया है । (अर्थात्‌ अब मेरा हृदय मोह-अनज्ञान से रहित हो गया है जिससे शकुन्तला के प्रणय की घटना याद आ गयी है) । पर इधर कामदेव भी मेरे ऊपर प्रहार करने के लिये उद्यत हो गया है ।
विदूषक:-- तो रुकिये । इस काठ के दण्ड से कामदेव के बाण को नष्ट कर देता हूँ । (काठ के डण्डे को उठाकर आम्र-मञ्जरी को गिराना चाहता है ) राजा:-- (मुस्कराहट के साथ) अच्छा, (तुम्हारा) ब्रह्मतेज देख लिया गया । हे मित्र, कहाँ बैठकर मैं अपनी प्रिय (शकुन्तला) का कुछ-कुछ अनुकरण करने वाली लताओं पर (अर्थात्‌ लताओं `को देखकर) अपनी दृष्टि को आनन्दित करुँ (बहलाऊँ) । विदूषक:-- आपने समीपवर्ती सेविका चतुरिका को आदेश किया है कि "माधवी लता के कुञ्च (मण्डप) में इस समय को बिताऊंगा । वहाँ मेरे अपने हाथ द्वारा चित्रपट पर बनाये गये मान्य शकुन्तला के चित्र को लाओ" । राजा:-- ऐसा मन बहलाने का स्थान है, तो उसी मार्ग को बताओ । विदूषक:-- आप इधर से, इधर से (आइये) । (दोनो चारो ओर घूमते हैं । सानुमती उनके पीछे-पीरे जाती है) विदूषक:-- यह मणिमय शिलापट्ट से युक्त माधवीकुञ् (पुष्पों के) उपहारो से रमणीय होने के कारण निःसन्देह मानो स्वागतपूर्वक हम दोनों को अमंत्रित करा रहा है (अर्थात्‌ हम दोनों को बुला रहा है) तो प्रवेश करके आप बैठिये । (दोनों प्रवेश कर बैठ जाते हैं) सानुमती:-- तब तक लता का आश्रय (ओट) लेकर सखी (शकुन्तला) के चित्र को देखती हूँ । तत्पश्चात्‌ इस (शकुन्तला) के पति (दुष्यन्त) के बहुमुखी (विविध प्रकार से प्रकट किये हुये) अनुराग को मैं उससे (शकुन्तला से) कहूंगी । (वैसा कर अर्थात्‌ लता में छिपकर खड़ी हो जाती है ) राजा:-- हे मित्र, अब शकुन्तला से सम्बद्ध पहले के सभी वृत्तान्त (घटना) को याद कर रहा हूँ । आप को मैंने (उसी समय) कहा (बताया) भी था । वह आप (उस शकुन्तला के) परित्याग के समय मेरे पास नहीं थे । (किन्तु) पहले भी आप के द्वारा उस (शकुन्तला) का नाम नहीं लिया गया (अर्थात्‌ आप ने याद नहीं दिलाया) । क्या तुम भी मेरी तरह भूल गये थे ? विदूषक:-- मैं नहीं भूलता । किन्तु सब कुछ कहकर अन्त में फिर आप ने कहा था कि - "यह सब हंसी की बात है, सत्य नही" । मिट्टी के लोदे के समान मन्द बुद्धि वाले मैंने भी उसी प्रकार (हंसी में कहा गया कथन) ही समझ लिया । अथवा भावी (होनवार) बलवान्‌ होती है । सानुमती:-- यह ऐसा (ही है) । राजा:-- (ध्यान करके) हे मित्र, मुझको बचाओ । विदूषक:-- अरे, यह क्या ? आप के विषय में निश्चय ही यह अनुचित है । सज्जन व्यक्ति कभी भी शोक के वशीभूत नहीं होते हैं । निश्चय ही ओंधी में भी पर्वत नहीं कांपते (अर्थात्‌ नहीं हिलते - अडिग रहते हैं) । राजा:-- हे मित्र, परित्याग से व्याकुल प्रियतम (शकुन्तला) की (तत्कालीन) दशा को याद कर मैं अत्यधिक असहाय (अधीर) हो गया हूँ । क्योकि वह यहाँ से (अर्थात्‌ मेरे द्वारा) अस्वीकार हो जाने के कारण अपने बान्धवो के पीछ-पीछे जाने के लिये प्रवृत्त हुयी (अर्थात्‌ अपने साथ आये हुये व्यक्तियों के पीछे-पीछे चलने लगी) । गुरु (पिता) के समान गुरुशिष्य (शार्खगरव) के "(यहीं) रुको" इस प्रकार जोर से (डांटकर) कहने पर खड़ी हो गयी (रुक गयी) । आंसुओं के प्रवाह से मलिन दृष्टि को फिर मुझ कठोर (क्रूर) पर जो डाली, वह (सारा दृश्य) विषयुक्त (विष से बुझे हुए) बाण की भाँती मुझको जला रहा है (अर्थात्‌ दुःखित कर रहा है) ।
सानुमती:-- अहो, ऐसी ही स्वार्थपरता (होती है कि) इस (राजा दुष्यन्त) के दुःख से मैं प्रसन्न हो रही हूँ । विदूषक:-- हे मित्र, मेरा अनुमान है कि आकाशचारी (प्राणी) के द्वारा मान्य (शकुन्तला) ले जायी गयी है (अर्थात्‌ उस आदरणीय को कोई आकाश में विचरण करने वाला (देवता) उठा ले गया है) । राजा:-- उस पतिव्रता को कौन दूसरा स्पर्श करने का साहस कर सकता है । मेने ऐसा सुना है कि मेनका तुम्हारी सखी (शकुन्तला) की जननी (जन्म देने वाली) है । उसकी सखियों के द्वारा तुम्हारी सखी (शकुन्तला) ले जायी गयी है (अर्थात्‌ उसकी सखियां तुम्हारी सखी शकुन्तला को ले गयी हैं) ऐसी मेरी हदय की आशङ्का है । सानुमती:-- (राजा का शकुन्तला को) भूलना (सम्मोह) ही आश्चर्य की बात है, स्मरण करना (आश्चर्य की बात) नहीं है । विदूषक:-- यदि ऐसा है तो निश्चित ही समय आने पर मान्य (शकुन्तला) से (आप का) मिलन होगा । राजा:-- कैसे ? विदूषक:-- वस्तुतः माता-पिता पति के वियोग से दुःखित पुत्री को अधिक समय तक नहीं देख सकते । राजा:-- हे मित्र, वह (शकुन्तला का मिलन) क्या स्वप्न था ? क्या वह माया थी ? क्या वह मेरी बुद्धि का भ्रम था ? अथवा क्या उतने ही फल वाला (मेरा) स्वल्प पुण्य था ? वह (शकुन्तला का मिलन) फिर कभी न लौटने के लिये चला गया । ये (मेरे) मनोरथ (नदी के) तट (किनारे) के पतन के समान है, (जो गिरकर फिर कभी नहीं उठते) ।
विदूषक:-- ऐसा न (कहिये) वस्तुतः यह अँगूठी ही उदाहरण (प्रमाण) है कि अवश्यम्भावी (अवश्य होने वाला) मिलन अचानक होता है । राजा:-- (अँगूठी को देखकर) अरे, यह तो दुर्लभ स्थान से गिर जाने वाली (अँगूठी) शोचनीय हो गयी है । हे अँगूठी, तुम्हारा पुण्य मेरे (पुण्य के) समान निश्चय ही स्वल्प (न्यून) है, (यह) परिणाम (फल) के द्वारा ही ज्ञात हो रहा है । जो कि उस (शकुन्तला) की लाल नाखूनों से मनोहर उंगलियों में स्थान प्राप्त कर (भी) तुम गिर गयी (च्युत हो गयी) हो ।
सानुमती:-- यदि यह (अँगूठी) दूसरे के हाथ में पड़ जाती तो सचमुच ही शोचनीय (शोक के योग्य) हो जाती । विदूषक:-- हे (मित्र), यह नाम वाली (नामांकित) अँगूठी किस प्रसङ्ग से उन माननीय (शकुंतला) के हाथ में दी गयी थी ? सानुमती:-- यह (विदूषक) भी मेरे (समान) जिज्ञासा से प्रेरित हुआ है (अर्थात्‌ मेरे समान ही इसको भी यह जानने की इच्छा है) । राजा:-- सुनो । अपने नगर (हस्तिनापुर) को प्रस्थान करते हुये मुझसे प्रिय (शकुन्तला) ने (आंखों मे) आंसू भरकर कहा (था) - आर्यपुत्र कितने दिनों मे (आप मुझे अपना) समाचार देंगे । विदूषक:-- तब, तब (क्या हुआ) फिर क्या हुआ ? राजा:-- तत्पश्चात्‌ इस अँगूठी को उसकी उंगली में पहनाते हुये मेरे द्वारा (यह) कहा गया (मैंने उससे कहा) - हे प्रिये, प्रतिदिन (इस अँगूठी पर ख़ुदे हुये) मेरे नाम के एक-एक अक्षर को गिनना । जब तक तुम (गिनती हुई) अन्त को (अर्थात्‌ अन्तिम अक्षर पर) पहंचोगी तब तक मेरे अन्तःपुर में प्रवेश कराने के लिये (तुम्हें) ले जाने वाला व्यक्ति तुम्हारे पास पहुंच जायेगा ।
राजा:-- और निष्ठुर (कठोर) हृदय वाले मरे द्वारा मोहवश (अज्ञानवश) वह कार्य पूरा नहीं किया गया । सानुमती:-- (यह) रमणीय अवधि विधाता (अथवा भाग्य) के द्वारा बिगाड़ दी गयी । विदूषक:-- कैसे (यह अँगूठी) धीवर (मल्लाह) द्वारा काटी गयी रोहू (रोहित) मछली के पेट के भीतर (पहुंच गयी) थी ? राजा:-- शची तीर्थ की वन्दना करती हुई तुम्हारी सखी (शकुन्तला) के हाथ से गंगा की धारा में गिर गयी थी । विदूषक:-- ठीक है । (यह सम्भव है) । सानुमती:-- यही कारण है कि अधर्म से डरने वाले इस राजर्षि को बेचारी (भोलीभाली) शकुन्तला के साथ विवाह के विषय में संदेह हो गया था। अथवा इस प्रकार का प्रेम (अनुराग) (भी) अभिज्ञान (निशानी) की अपेक्षा रखता है - यह कैसी बात है । राजा:-- तो इस अँगूठी को उलाहना दूंगा । विदूषक:-- (अपने मन में) इस (राजा दुष्यन्त) के द्वारा (अब) पागलों का मार्ग पकड़ लिया गया है । राजा:-- (अँगूठी को देखकर) हे अँगूठी, सुन्दर और कोमल उंगलियों वाले उस हाथ को छोडकर तुम कैसे जल में डूब गयी (गिर गयी) ? अथवा अचेतन (वस्तु) गुणों को नहीं देख सकती । (किन्तु चेतन होते हुये भी) मेरे द्वारा ही क्यों प्रिय (शकुन्तला) अपमानित की गयी ( अर्थात्‌ मैने ही प्रिय का अपमान क्यों किया ) ?
विदूषक:-- (अपने मन में) क्या मैं भूख के द्वारा खा लिया जाऊंगा (अर्थात्‌ मुझे भूख बहुत अधिक सता रही है) । राजा:-- प्रिये, बिना कारण (तुम्हारे) परित्याग के कारण पश्चात्ताप (अनुशय) से सन्तप्त हृदय वाले इस व्यक्ति (मुझ दुष्यन्त) को फिर से दर्शन देकर अनुगृहीत (कृतार्थ) करो । (चित्रपट हाथ में ली हुई पर्दा हटाने के साथ प्रवेश कर) चतुरिका:-- यह चित्रलिखित (चित्र में बनायी गयी) स्वामिनी (शकुन्तला) हैं । (चित्रपट को दिखाती है) । विदूषक:-- (देखकर) मित्र, (बहुत) सुन्दर है । भावों की अभिव्यक्ति सुन्दर (अवयव के) विन्यास (अवस्थान) के कारण दर्शनीय है । मेरी दृष्टि ऊँचे-नीचे स्थानों पर मानो लड़खडा रही (फिसल जा रही) है । सानुमती:-- ओह, यह है राजर्षि (दुष्यन्त) (के चित्र बनाने) की निपुणता । लगता है कि (मेरी) सखी (शकुन्तला) मेरे सम्मुख विद्यमान है । राजा:-- चित्र में जो-जो सुन्दर नहीं है (अर्थात्‌ त्रुटिपूर्ण है) वह सब (मेरे द्वारा) ठीक किया जा रहा है (अर्थात्‌ उसको मैं अभी ठीक कर रहा हूँ) । फिर भी उस (शकुन्तला) का सौन्दर्य रेखाओं के द्वारा कुछ ही प्रकट हो पाया है ।
सानुमती:-- पश्चाताप के कारण बढ़े हुये (गुरु) प्रेम और अभिनशुन्यता के अनुरूप ही यह (कथन) है । विदूषक:-- हे (मित्र) (इस चित्रपट में) तीन माननीय युवतियाँ दिखायी दे रहीं हैं । सभी दर्शनीय (सुंदर) हैं । यहाँ (इनमें) श्रीमती शकुन्तला कौन हैं ? सानुमती:-- निष्फल दृष्टि वाला यह व्यक्ति (विदूषक) निश्चय ही इस प्रकार के अनुपम रूप से अनभिज्ञ है । राजा:-- तुम (इनमें से) किसको (शकुन्तला) समझ रहे हो ? विदूषक:-- मैं समझता हूँ कि ढीली चोटी से गिर गये है पुष्प जिसके ऐसे केशपाश वाली उभरी हुई (दिखायी देने वाली) पसीने की बूंदों वाले मुख (तथा) अत्यधिक झुकी हुई भुजाओं से युक्त और सीचने के कारण चिकने नवीन पत्तों वाले आम्र-वृक्ष के समीप कुछ थकी हुई सी जो चित्रित की गयी है, वह शकुन्तला हैं । दूसरी दो सखियाँ हैं । राजा:-- आप (सचमुच) चतुर हो । यहाँ (इस चित्र में) मेरे (सात्विक) भाव का सङ्केत (चिन्ह) है । (चित्र की) रेखाओं के किनारों पर पसीने से युक्त उंगलियों का मलिन निशान दिखायी दे रहा है और रंग के फूल जाने के कारण यह (शकुन्तला) के गालों पर गिरा हुआ आंसू (भी) दृष्टिगोचर हो रहा है ।
चतुरिका, (मेरे) मनोरंजन का यह साधन अधुरा (ही) चित्रित है । तो जाओ, (चित्र मे रंग भरने के लिये) कूची (ब्रश) ले आओ । चतुरिका:-- आर्य माधव्य, चित्रपट को पकड़िये, जब तक मैं आती हूँ । राजा:-- मैं ही इसको पकड़ता हूँ । (कहने के अनुसार करता है अर्थात्‌ चित्रपट पकड़ता है) । (दासी निकल जाती है) राजा:-- (लम्बी संस लेकर) मैं तो हे मित्र, पहले साक्षात्‌ (स्वयम्‌) समीप में आयी हुई (प्राप्त हुई) प्रिय (शकुन्तला) को त्यागकर अब चित्रगत इसको बहुत समझता हुआ (बहुत आदर देता हुआ) मैं मार्ग मे अधिक जल वाली नदी को लांघकर (छोडकर) मृगतृष्णा (मृगमरीचिका) में प्रेम करने वाला हो गया हूँ ।
विदषक:-- (अपने मन में) ये महानुभाव (महाराज) नदी को लांघकर मृगतृष्णा में प्रविष्ट हो गये हैं । (प्रकट रूप में) हे (मित्र), यहाँ (इस चित्र में) और क्या लिखना (बनाना) है ? सानुमती:-- जो-जो स्थान मेरी सखी (शकुन्तला) को प्रिय (अभिरूप) हैं, उन सबको चित्रित करने के इच्छुक होंगे । राजा:-- सुनो ! जिसके रेतीले (बालुकामय) तट पर हंसयुगल (हंसो का जोड़ा) बैठा हुआ है ऐसी मालिनी नदी चित्रित करनी (बनानी) है । उसके दोनों ओर (पार्वती के पिता) हिमालय की (ऐसी) पवित्र पहाड़ियां (बनानी हैं), जिनपर हरिण बैठे हुये हैं । जिसकी शाखाओं (डालियों) पर (सूखने के लिये) वल्कल-वस्त्र लटक रहे हैं ऐसे वृक्ष के नीचे काले हरिण के सींग पर (अपनी) बाई आंख को खुजलाती हुई हरिणी को बनाने की इच्छा करता हूँ (बनाना चाहता हूँ) ।
विदूषक:-- (अपने मन में) जैसा मैं देख रहा हूँ कि इनके द्वारा यह चित्रपट लम्बी दाढ़ी वाले तपस्वियों के झुंड से भर दिया जायेगा । राजा:-- हे मित्र, ओर भी । शकुन्तला की जो सजावट हम करना चाहते थे, वह यहाँ (चित्र में) भूल ही गये हैं ? विदूषक:-- वह क्या ? सानुमती:-- जो वनवास, सुकुमारता और विनय के अनुकूल होगा । राजा:-- हे मित्र, कानों मे संलप्र डण्ठल वाला और कपोलों तक लटकते हुये केसर (पराग) वाला शिरीष (शिरस) का पुष्प नहीं चित्रित किया गया है तथा स्तनों के बीच में शरद्‌ ऋतु के चन्द्रमा की किरणों के समान कोमल कमल-नाल का हार (भी) नहीं रचा गया (बनाया गया) है ।
विदूषकः:-- हे (मित्र), आदरणीय (शकुन्लता) लाल कमल के नये पत्ते के समान सुशोभित हाथ के अगले भाग (अर्थात्‌ उंगलियों) से मुख को ठककर अत्यन्त भयभीत सी खड़ी हैं । (सावधानी से विचार कर और देखकर) ओह, यह नीच (दासी का बेटा) पुष्प के रस को चुराने वाला भ्रमर मान्य (शकुन्तला) के मुखकमल पर आक्रमण कर रहा (मंडरा रहा) है । राजा:-- तो यह ढीठ (भ्रमर) रोका (हटाया) जाय (अर्थात्‌ इस ढीठ भौंरे को हटाओ) । विदूषक:-- दुष्टो के शासक (दण्ड देने वाले) आप ही इसके निवारण (अर्थात्‌ इसको हटाने) में समर्थ होंगे । राजा:-- ठीक है । अरे हे पुष्पलता के प्रिय अतिथि, तुम क्यों यह (शकुन्तला के मुखमण्डल के चारो ओर) चक्कर काटने (अर्थात्‌ मंडराने) का कष्ट उठा रहे हो ? (तुम पर) अनुरक्त यह भ्रमरी प्यासी होकर पुष्प पर बैठी हुई भी (तुम्हारी) प्रतीक्षा कर रही है । तुम्हारे बिना पुष्परस को (भी) नहीं पी रही है । सानुमती:-- आज (इस दशा में) (राजा द्वारा) यह (भ्रमर) अत्यन्त शिष्ट (अच्छे) ढंग से रोका गया है। विदूषक:-- यह (भ्रमर) जाति रोकी जाने पर भी विपरीत (उल्टा) कार्य करने वाली (होती है) । राजा:-- क्यो रे, तू मेरे आदेश (शासन) में नहीं है (अर्थात्‌ मेरी आज्ञा नहीं मानता है) ? तो अब तु सुन ले - हे भ्रमर, न मुरझाए हुए (अथवा किसी के द्वारा स्पर्श न किये गये) नवीन तरुपल्लव के सामन लुभावने (मनोहर) तथा मेरे द्वारा रतिकाल में (भी) दयापूर्वक पान किये गये (मेरी) प्रिय (शकुन्तला) के बिम्बफल के समान (लाल) अधर को यदि तुम छूओगे (तो) तुमको कमल के मध्य-भाग रूपी कारागार में स्थित (बन्द) करा दूंगा ।
विदूषक:-- इस प्रकार कठोर दण्ड देने वाले (आप) से (यह) क्यों नहीं डरेगा। (हंसकर, अपने मन में) यह (राजा) तो पागल (उन्मत) हो गया है । मैं भी इस (राजा) की संगति के कारण इसी प्रकार का (अर्थात्‌ पागल जैसा) हो गया हूँ । (प्रकट रूप में) हे (मित्र), यह तो चित्र है (वास्तविक दृश्य नहीं है) । राजा:-- क्या (यह) चित्र है ? सानुमती:-- मैं भी यथार्थ को अब समझ पायी हूँ (कि यह चित्र है) । फिर चित्र के अनुसार अनुभव करने वाले इस राजा का क्या कहना । राजा:-- हे मित्र, तुमने क्या धृष्टता (ढिठायी) कर दी ? तन्मय हृदय से मानो (प्रिय के) साक्षात्‌ दर्शन सुख का अनुभव करने वाले मुझको, (यह चित्र है ऐसा) स्मरण करा देने वाले तुम्हारे द्वारा (मेरी) प्रिय (शकुन्तला) फिर से चित्र बना दी गयी है (आंसुओं को बहाता है) ।
सानुमती:-- पहली और बाद की घटना का विरोधी यह विरहमार्ग निराला (अपूर्व) है । अर्थात्‌ यह विरह का मार्ग आगे और पीछे की बातों से तालमेल न रखने वाला अपूर्व है । राजा:-- हे मित्र, क्यों इस प्रकार निरन्तर (कभी शान्त न होने वाले, अविश्रान्त) दुःख का अनुभव कर रहा हूँ? (रात भर) जागते रहने के कारण उस (शकुन्तला) का स्वप्न में समागम (मिलन) अवरुद्ध हो गया है और आंसू चित्रस्थित भी इस (शकुन्तला) को देखने नहीं देता है ।
सानुमती:-- तब शकुन्तला के परित्याग का दुख तुम्हारे द्वारा सब प्रकार से धो दिया (दूर कर दिया) गया है । (प्रवेश कर) चतुरिका:-- जय हो, स्वामी की जय हो (चित्र में रंग भरने के लिये) कूुचियों की पेटी (वर्तिकाकरण्डक) को लेकर मैं इधर की ओर आ रही थी । राजा:-- फिर क्या हुआ ? चतुरिका:-- यह (कूचियो की पेटी) मेरे हाथ से तरलिका जिनका अनुगमन कर रही थी ऐसी (अर्थात्‌ तरलिका के साथ वहां उपस्थित) महारानी वसुमती के द्वारा "मैं ही महाराज के पास (इसे) पहुंचाऊंगी" - ऐसा कहकर बलपूर्वक ले ली गयी । विदूषक:-- भाग्य से तुम छूट गयी हो । चतुरिका:-- जब तक (वृक्ष की) शाखा (डाली) में फंसे महारानी के दुपट्टे को तरलिका छुड़ाने लगी तब तक मेरे द्वारा अपना शरीर बचा लिया गया (अर्थात्‌ मैं अपने को बचा कर भाग आयी) । राजा:-- हे मित्र, महारानी आने वाली हैं और अत्यधिक मान से गर्वित हैं । आप इस चित्र की रक्षा करें। विदूषक:-- यह कहो कि अपने को (अर्थात्‌ मुझे) बचाओ । (चित्रपट को लेकर और उठकर) यदि अन्तःपुर के कूट-जाल से मुक्त हों तब मुझको "मेघप्रतिच्छन्द" नामक भवन में पुकारना । (तेजी से पैर बढ़ाता हुआ निकल जाता है) सानुमती:-- अन्य (शकुन्तला में) संलग्र हृदय वाला यह (राजा) इस समय (वसुमती के प्रति) शिथिल (स्वल्प) प्रेम युक्त (होने पर भी) (उसके साथ हुये) प्रथम प्रणय का ध्यान रखता है ? (हाथ में पत्र ली हुई प्रवेश कर) प्रतीहारी:-- जय हो, महाराज की जय हो । राजा:-- वेत्रवती, तुम्हारे द्वारा (मार्ग) के बीच में महारानी (तो) नहीं देखी गयी हैं (अर्थात्‌ तुमने महारानी वसुमती को तो नहीं देखा है) । परतीहारी:-- ओर क्या (अर्थात्‌ हाँ देखा था) ! मुझे हाथ में पत्र लिये हुये देखकर लौट गयीं । राजा:-- कार्यों को जानने वाली (महारानी वसुमती) मेरे कार्यों में विघ्न नहीं डालती हैं । प्रतीहारी:-- महाराज ! मन्त्री निवेदन कर रहे हैं कि (कर रूप में प्राप्त) धन-राशि की गणना (गिनने) की अधिकता के कारण नगर-वासियों नागरिको का (केवल) एक ही कार्य देखा गया है । पत्र पर चढ़ाए गये (अङ्कित) उस (कार्य) को महाराज (आप) देख लें । राजा:-- इधर (मुझको) पत्र दिखाओ । (प्रतिहारी पास ले जाती है) राजा:-- (पढ़कर) (यह) क्या ! समुद्र के द्वारा व्यापार करने वाला, व्यापारियों का प्रधान (सार्थवाह) धनमित्र नौका-दुर्घटना में मर गया । ओर वह बेचारा निःसन्तान था । "उसकी धनराशि राजा के पास जानी चाहिये" यह मंत्री के द्वारा लिखा गया है । सन्तानहीनता निश्चय ही कष्टदायक है । वेत्रवती, अत्यधिक धन होने के कारण उस आदरणीय (व्यापारी) को बहुत पत्नियों वाला होना चाहिये । पता लगाया जाए - शायद उसकी पत्नियों मे कोई गर्भिणी हो । प्रतीहारी:-- महाराज, सुना जा रहा है कि अयोध्या के सेठ की पुत्री जिसका पुंसवन संस्कार अभी हुआ है, इसकी पत्नी है । राजा:-- तो गर्भ में स्थित सन्तान पिता के धन का अधिकारी है । जाओ । मंत्री से इस प्रकार कह दो । प्रतीहारी:-- महाराज जो आज्ञा देते हैं । (चल देती है) राजा:-- जरा इधर आओ । प्रतीहारी:-- यह मैं हूँ । राजा:-- इससे क्या कि सन्तान है अथवा नहीं है । प्रजाजन (अपने) जिस-जिस स्नेही सम्बन्धी बन्धु से (मृत्यु के कारण) वियुक्त हो जाते हैं, पापकर्म के अतिरिक्त (यह) दुष्यन्त (अर्थात्‌ मैं) उनका वह-वह (सम्बन्धी) है, ऐसी घोषणा कर दी जाए।
प्रतीहारी:-- इसी प्रकार घोषणा करानी चाहिये । (निकलकर, पुनः प्रवेश कर) समय से हुई वर्षा की भाँति महाराज के आदेश का (प्रजा द्वारा) अभिनन्दन किया गया । राजा:-- (लम्बी और गर्म साँस लेकर) ओह, सन्तान के अभाव के कारण निराश्रित कुलों की सम्पत्तियां मूलपुरुष (वंश के प्रतिनिधि) के मर जाने पर दूसरे के पास चली जाती हैं । मेरे भी मर जाने पर पुरुवंश की लक्ष्मी की यही दशा होगी । प्रतीहारी:-- अमङ्गल नष्ट (हो) । राजा:-- आये हुये (शकुन्तला रूपी) कल्याण की अवहेलना (तिरस्कार) करने वाले मुझको धिक्कार है । सानुमती:-- निःसन्देह (मेरी) सखी (शकुन्तला) को ही हृदय में रखकर इनके (राजा के) द्वारा अपनी निन्दा की गयी है । राजा:-- (उचित) समय पर जिसमें बीज बोया गया है ऐसी और महान्‌ फल को प्रदान करने में समर्थ पृथ्वी की भाँति, वंश की प्रतिष्ठास्वरूप धर्मपत्नी (शकुन्तला) का, (उसके गर्भ में पुत्र के रूप में) अपने-आप को संरोपित (स्थापित) कर देने पर भी, मेरे द्वारा परित्याग कर दिया गया।
सानुमती:-- अब तुम्हारी वंशपरम्परा (सन्तति) अविच्छिन्न (अटूट) रहेगी । चतुरिका:-- (हाथ की ओट में) अरे, इस प्रमुख व्यापारी (धनमित्र) के वृत्तान्त से स्वामी दूनी व्याकुलता वाले हो गये हैं । इनको आश्वासन देने के लिये "मेघप्रतिच्छन्द" (नामक भवन) से आर्य माधव्य को लेकर आओ । प्रतीहारी:-- तुम ठीक कहती हो । (निकल जाती है) । राजा:-- ओह, दुष्यन्त के (अर्थात्‌ मेरे) पितृगण संशय में पड़ गये हैं । क्योकि खेद है कि "इस (दुष्यन्त) के बाद हमारे वंश में वेद्विहित विधि के अनुसार तैयार किये गये श्राद्ध-तर्पण को कौन देगा" इस प्रकार (सोचकर) निश्चय ही (मेरे) पित्रगण (पितर्‌ लोग) निःसन्तान मेरे द्वारा दिये गये जल (के उस भाग) को पीते हैं, जो उनके आंसुओं के धोने से अवशिष्ट होता है । (मूर्छित हो जाता है) ।
चतुरिका:-- (घबराहट के साथ देख कर) स्वामी (आप) धैर्य धारण करें, धैर्य धारण करें । सानुमती:-- हाय धिक्कार है, हाय धिक्कार है । (पुत्ररूप) दीपक के होने पर भी (मोहरूप आवरण-दोष के कारण ये (राजा) अन्धकार (निःसन्तान) होने का अनुभव कर रहे हैं । मैं इसी समय ही (इनको शकुन्तला का समाचार देकर) शान्त कर देती हूँ । अथवा शकुन्तला को आश्वासन देती हुई इन्द्र की माता (अदिति) के मुख से मैने सुना था कि यज्ञ में (अपने) भाग (को पाने) के लिये उत्सुक देवता ही वैसा (उपाय) करेंगे, जिससे शीघ्र ही महारज (दुष्यन्त अपनी) धर्म-पत्नी (शकुन्तला) को अभिनन्दित करेंगे (अर्थात्‌ स्वागत-पूर्वक स्वीकार कर लेंगे)। तो उचित समय की प्रतीक्षा करनी चाहिये । तब तक इस (राजा) के वृत्तान्त से (अपनी) प्रियसखी शकुन्तला को सान्त्वना देती हूं । (उदुप्रान्तक नृत्य के साथ निकल जाती है) । (नेपथ्य में) अनिष्ट हो गया । राजा:-- (चेतना में आकर, कान लगाकर) अरे, माधव्य के समान करुण क्रन्दन है । अरे, कौन है, कौन है यहाँ ? (प्रवेश कर) प्रतीहारी:-- (घबराहट के साथ) महाराज, संकट में पड़े हुये मित्र (माधव्य) की रक्षा की जाय। राजा:-- किसके द्वारा बेचारा (माणवक) अभिभूत (अपमानित) हुआ है ? प्रतीहारी:-- अदृष्ट रूप वाले किसी प्राणी (भूत-प्रेत आदि) के द्वारा पकड़ कर "मेघप्रतिच्छन्द" नामक भवन की ऊपरी छत पर वह ले जाया गया है । राजा:-- (उठकर) ऐसा न (कहो) । क्या मेरे भी घर भूत-प्रेतों द्वारा अक्रमण किये जाने लगे हैं? अथवा प्रतिदिन अपनी ही प्रमाद्‌-जन्य (प्रमाद के कारण उत्पन्न) त्रुटियों को जानना सम्भव नहीं है । (तब) प्रजाजनों में कौन किस मार्ग से जा रहा है, यह पूर्णरूप से जानने में (किसका) सामर्थ्य है ।
(नेपथ्य में) हे मित्र, बचाओ, बचाओ । राजा:-- (चाल बदलकर घूमता हुआ) हे मित्र, डरो मत, डरो मत। (नेपथ्य में) (उसी बात को फिर कहकर) क्यो न डरूं ? यह कोई मेरी गर्दन को घुमाकर गन्ने की तरह तीन टुकड़े कर रहा है । राजा:-- (दृष्टि घुमाकर) तो धनुष (ले आओ) । (हाथ में धनुष ली हई प्रवेशकर) यवनी:-- स्वामी, हस्तकवच (दास्ताने) के सहित यह धनुष है । (राजा बाण के सहित धनुष को ले लेते हैं) । (नेपथ्य में) गर्दन के ताजे रक्त का इच्छुक मैं छटपटाते हुये तुम (विदूषक) को (उसी प्रकार) मारता हूँ, जैसे बाघ (छटपटाते हुये) पशु को मारता है । पीड़ितों के भय को दूर करने के लिये धनुष को धारण कर लेने वाला दुष्यन्त अब तुम्हारा रक्षक बने ।
राजा:-- (क्रोधपूर्वक) क्या मुझे ही लक्षित कर कह रहा है ? ठहर शव (मांस) भक्षी (राक्षस), तुम अब नहीं रहोगे । (धनुष चढ़ाकर) वेत्रवती सीढ़ी का मार्ग बताओ । प्रतीहारी:-- महाराज, इधर से, इधर से (आईये) । (सभी लोग शीघ्रता से पास में आ जाते हैं) राजा:-- (चारों ओर देखकर) यह (स्थान) तो शून्य है (अर्थात्‌ यहाँ तो कोई नहीं है) । (नेपथ्य में) बचाओ, बचाओ । मैं आदरणीय आप को देख रहा हूँ । क्या आप मुझको नहीं देख रहे हैं ? बिल्ली के द्वारा पकड़े गये चूहे की भाँति मैं (अपने) जीवन के प्रति निराश हो गया हूँ । राजा:-- हे अदृश्य होने की (तिरस्करिणी) विद्या से गर्वयुक्त, मेरा अस्त्र तुमको देखेगा । तो यह मैं उसी बाण को चढ़ाता हूँ । जो मारने (वध करने) के योग्य तुमको मार डालेगा और रक्षा करने के योग्य ब्राह्मण (विदूषक) को बचा लेगा । जैसे कि हंस दूध को ले लेता है और उसमे मिले हुये जल को छोड देता है । (बाण चढ़ाता है) ।
(तत्पश्चात्‌ विदूषक को छोडकर मातलि प्रवेश करता हे) । मातलिः:-- इन्द्र के द्वारा आप (दुष्यन्त) के (बाणों के) लक्षय राक्षस बनाये गये हैं । (आप) उन (राक्षसों) के ऊपर (अपने) इस धनुष को खींचिये (चलाइये) । सज्जनों की मित्र-जनों पर दया से शान्त दृष्टि (ही) पड़ती है (न कि), कठोर (भयङ्कर) बाण ।
राजा:-- (शीघ्रता से अस्त्र को उतारता हुआ) अरे मातलि (आप हैं) । इन्द्र के सारथी (आप का) स्वागत है । (प्रवेश करके) विदूषक:-- जिसके द्वारा मैं यज्ञीय पशु की मार मारा गया हूँ । वह इन (राजा) के द्वारा स्वागतपूर्वक अभिनन्दित (सत्कृत) किया जा रहा है । मातलि:-- (मुस्कराकर) चिरंजीविन्‌ , सुनिये जिसके लिये मैं इन्द्र के द्वारा आप के पास भेजा गया हूँ । राजा:-- मैं (सुनने के लिये) सावधान हूँ । मातलि:-- कालनेमि की सन्तान दुर्जय नामक राक्षसों का समूह है । राजा:-- है । मेरे द्वारा पहले ही नारद से सुना गया था। मातलि-- वह (राक्षस-दल) निश्चय ही आपके मित्र इन्द्र के लिये अजेय हैं । आप युद्ध-भूमि में उस (रक्षस-दल) को मारने वाले (हन्ता) माने गये हैं । सूर्य रात्रि के जिस अन्धकार को नष्ट करने में समर्थ नहीं होता, उस (अन्धकार) को चन्द्रमा दूर कर देता है ।
वह आप शस्त्र धारण किये हुये ही अब इन्द्र के (इस) रथ पर चढ़कर विजय के लिये प्रस्थान करें । राजा:-- मैं इन्द्र के इस सम्मान से अनुगृहीत हूँ । अच्छा, आप के द्वारा माधव्य के प्रति ऐसा (व्यवहार) क्यों किया गया ? मातलि:-- उसे भी कह रहा हूँ । मैने किसी कारण से चिरंजीवी आपको मानसिक सन्ताप के कारण व्याकुल देखा । (इसके) बाद चिरंजीवी आप को कुपित करने के लिये मेने (माधव्य के साथ) वैसा (व्यवहार) किया है । क्योकि अग्नि इन्धन के चलाने (हिलाने-डुलाने) से प्रज्वलित हो जाता है । सर्प छेड़ने पर फण (फन) को फैलाता है । इसी प्रकार व्यक्ति प्रायः उत्तेजना के कारण (ही) अपने प्रभाव (पराक्रम) को धारण करता (प्रकट करता) है ।
राजा:-- (हाथ की ओट में) हे मित्र, स्वर्ग के स्वामी (इंद्र) की आज्ञा अनुलङ्घनीय है । इसलिये इस विषय में अवगत कराकर मेरे आदेशानुसार मंत्री पिशुन से कहना कि अकेली आप की बुद्धि तब तक प्रजा का पूर्णरूप से पालन करे, (जब तक) यह चढ़ी हुई डोरी (परत्यञ्चा) वाला (मेरा) धनुष (राक्षसों के वध रूपी) दूसरे कार्य में लगा हुआ है।
विदूषक:-- आप जो आज्ञा देते हैं । (निकल जाता है) । मातलि:-- चिरंजीवी (आप रथ पर चढ़ें) । (राजा रथ पर चढ़ने का अभिनय करते हैं) (सभी निकल जाते हैं) ॥ षष्ठ अंक समाप्त ॥
Krishjan
धर्म का अन्वेषण
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