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अभिज्ञानशाकुन्तलम् • अध्याय 6 • श्लोक 28
(ततः प्रविशति विदूषकमुत्सुज्य मातलिः) मातलिः- राजन्‌ , कृताः शरव्यं हरिणा तवासुराः शरासनं तेषु विकृष्यतामिदम्‌ । प्रसादसौम्यानि सतां सुहृज्जने पतन्ति चक्षुषि न दारुणाः शराः ।।
(तत्पश्चात्‌ विदूषक को छोडकर मातलि प्रवेश करता हे) । मातलिः:-- इन्द्र के द्वारा आप (दुष्यन्त) के (बाणों के) लक्षय राक्षस बनाये गये हैं । (आप) उन (राक्षसों) के ऊपर (अपने) इस धनुष को खींचिये (चलाइये) । सज्जनों की मित्र-जनों पर दया से शान्त दृष्टि (ही) पड़ती है (न कि), कठोर (भयङ्कर) बाण ।
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