(तत्पश्चात् विदूषक को छोडकर मातलि प्रवेश करता हे) ।
मातलिः:--
इन्द्र के द्वारा आप (दुष्यन्त) के (बाणों के) लक्षय राक्षस बनाये गये हैं । (आप) उन (राक्षसों) के ऊपर (अपने) इस धनुष को खींचिये (चलाइये) । सज्जनों की मित्र-जनों पर दया से शान्त दृष्टि (ही) पड़ती है (न कि), कठोर (भयङ्कर) बाण ।
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