सानुमती:--
तब शकुन्तला के परित्याग का दुख तुम्हारे द्वारा सब प्रकार से धो दिया (दूर कर दिया) गया है ।
(प्रवेश कर) चतुरिका:--
जय हो, स्वामी की जय हो (चित्र में रंग भरने के लिये) कूुचियों की पेटी (वर्तिकाकरण्डक) को लेकर मैं इधर की ओर आ रही थी ।
राजा:--
फिर क्या हुआ ?
चतुरिका:--
यह (कूचियो की पेटी) मेरे हाथ से तरलिका जिनका अनुगमन कर रही थी ऐसी (अर्थात् तरलिका के साथ वहां उपस्थित) महारानी वसुमती के द्वारा "मैं ही महाराज के पास (इसे) पहुंचाऊंगी" - ऐसा कहकर बलपूर्वक ले ली गयी ।
विदूषक:--
भाग्य से तुम छूट गयी हो ।
चतुरिका:--
जब तक (वृक्ष की) शाखा (डाली) में फंसे महारानी के दुपट्टे को तरलिका छुड़ाने लगी तब तक मेरे द्वारा अपना शरीर बचा लिया गया (अर्थात् मैं अपने को बचा कर भाग आयी) ।
राजा:--
हे मित्र, महारानी आने वाली हैं और अत्यधिक मान से गर्वित हैं । आप इस चित्र की रक्षा करें।
विदूषक:--
यह कहो कि अपने को (अर्थात् मुझे) बचाओ । (चित्रपट को लेकर और उठकर) यदि अन्तःपुर के कूट-जाल से मुक्त हों तब मुझको "मेघप्रतिच्छन्द" नामक भवन में पुकारना । (तेजी से पैर बढ़ाता हुआ निकल जाता है)
सानुमती:--
अन्य (शकुन्तला में) संलग्र हृदय वाला यह (राजा) इस समय (वसुमती के प्रति) शिथिल (स्वल्प) प्रेम युक्त (होने पर भी) (उसके साथ हुये) प्रथम प्रणय का ध्यान रखता है ?
(हाथ में पत्र ली हुई प्रवेश कर)
प्रतीहारी:--
जय हो, महाराज की जय हो ।
राजा:--
वेत्रवती, तुम्हारे द्वारा (मार्ग) के बीच में महारानी (तो) नहीं देखी गयी हैं (अर्थात् तुमने महारानी वसुमती को तो नहीं देखा है) ।
परतीहारी:--
ओर क्या (अर्थात् हाँ देखा था) ! मुझे हाथ में पत्र लिये हुये देखकर लौट गयीं ।
राजा:--
कार्यों को जानने वाली (महारानी वसुमती) मेरे कार्यों में विघ्न नहीं डालती हैं ।
प्रतीहारी:--
महाराज ! मन्त्री निवेदन कर रहे हैं कि (कर रूप में प्राप्त) धन-राशि की गणना (गिनने) की अधिकता के कारण नगर-वासियों नागरिको का (केवल) एक ही कार्य देखा गया है । पत्र पर चढ़ाए गये (अङ्कित) उस (कार्य) को महाराज (आप) देख लें ।
राजा:--
इधर (मुझको) पत्र दिखाओ ।
(प्रतिहारी पास ले जाती है)
राजा:--
(पढ़कर) (यह) क्या ! समुद्र के द्वारा व्यापार करने वाला, व्यापारियों का प्रधान (सार्थवाह) धनमित्र नौका-दुर्घटना में मर गया । ओर वह बेचारा निःसन्तान था । "उसकी धनराशि राजा के पास जानी चाहिये" यह मंत्री के द्वारा लिखा गया है । सन्तानहीनता निश्चय ही कष्टदायक है । वेत्रवती, अत्यधिक धन होने के कारण उस आदरणीय (व्यापारी) को बहुत पत्नियों वाला होना चाहिये । पता लगाया जाए - शायद उसकी पत्नियों मे कोई गर्भिणी हो ।
प्रतीहारी:--
महाराज, सुना जा रहा है कि अयोध्या के सेठ की पुत्री जिसका पुंसवन संस्कार अभी हुआ है, इसकी पत्नी है ।
राजा:--
तो गर्भ में स्थित सन्तान पिता के धन का अधिकारी है । जाओ । मंत्री से इस प्रकार कह दो ।
प्रतीहारी:--
महाराज जो आज्ञा देते हैं । (चल देती है)
राजा:--
जरा इधर आओ ।
प्रतीहारी:--
यह मैं हूँ ।
राजा:--
इससे क्या कि सन्तान है अथवा नहीं है । प्रजाजन (अपने) जिस-जिस स्नेही सम्बन्धी बन्धु से (मृत्यु के कारण) वियुक्त हो जाते हैं, पापकर्म के अतिरिक्त (यह) दुष्यन्त (अर्थात् मैं) उनका वह-वह (सम्बन्धी) है, ऐसी घोषणा कर दी जाए।
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