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अभिज्ञानशाकुन्तलम् • अध्याय 6 • श्लोक 22
सानुमती- सर्वथा प्रमार्जितं त्वया प्रत्यादेशदुःखं शकुन्तलायाः । (प्रविश्य) चतुरिका जयतु जयतु भर्ता । वर्तिकाकरण्डकं गृहीत्वेतोमुखं प्रस्थितास्मि । राजा--कि च? चतुरिका-स मे हस्तादन्तरा तरलिकादितीयया देन्या बसुमत्याऽहमेवार्यपुत्रस्योपनेष्यामीति सबलात्कारं गृहीतः । विदृषकः--दिष््या त्वं मुक्ता । चतुरिका--यावद्‌ देव्या विटपलग्नमुत्तरीयं तरलिका मोचयति तावन्मया निर्वाहित आत्सा । राजा-- वयस्य, उपस्थिता देवी बहुमानगर्विता च । भवानिमां प्रतिकृतिं रक्षतु । लिदूषक्छः- आत्मानमिति भण । ( चित्रफलकमादायोत्थाय च) यदि भवानन्तःपुरकूटवागुरातो मोश्ष्यते तदा मां मेघप्रतिच्छन्दे प्रासादे शब्दायय । सानुमती--अन्यसलङ्क्रान्तहदयोऽपि प्रथमसम्भावनामपेक्षते शिथिलसौहादं इदानीमेषः । (प्रविश्य पत्रहस्ता) प्रतीहारी- जयतु जयतु देवः । राजा- वेत्रवति, न खल्वन्तरा दृष्टा त्वया देवी । प्रतीहारी--अथ किम्‌ । पत्रहस्तां मां प्रक्षय प्रतिनिवृत्ता । राजा-- कार्यज्ञा कार्योपरोधं मे परिहरति । प्रतीहारी- देव, अमात्यो विज्ञापयति - अर्थजातस्य गणनाबहुलतयैकमेव पौरकार्यमवेक्षितं तदेवः पत्रारूढं प्रत्यक्षीकरोतु - इति । राजा-इतः पत्रं ट्‌श्यि । (प्रतिहार्युपनयति) राजा-(अनुवाच्य) कथम्‌ ? समुद्रव्यवहारी सार्थवाहो धनमित्रो नाम नौव्यसने विपन्नः । अनपत्यःकिल तपस्वी । राजगामी तस्यार्थसञ्चय इत्येतदमात्येन लिखितम्‌ । कष्टं खल्वनपत्यता । वेत्रवति, बहुधनत्वाद्‌ बहुपत्नीकेन तत्रभवता भवितव्यम्‌ । विचार्यतां यदि काचिदापन्नसत््वा तस्य भासि स्यात्‌ । प्रतीहारी- देव, इदानीमेव साकेतकस्य श्रेष्ठिनो दुहिता निर्वृत्तपुंसवना जायाऽस्य श्रूयते । राजा- ननु गर्भः पित्र्यं रिक्थमर्हति । गच्छ । एवमीत्यं बृहि । प्रतीहारी-- यद्‌ देव आज्ञावयति । राजा-- एहि तावत्‌ । प्रतीहारो-- इयमस्मि । राजा-- किमनेन सन्ततिरस्ति नास्तीति । येन॒ येन वियुज्यन्ते प्रजाः स्निग्धेन बन्धुना । स॒ स पापादृते तासां दुष्यन्त इति घुष्यताम्‌ ।।
सानुमती:-- तब शकुन्तला के परित्याग का दुख तुम्हारे द्वारा सब प्रकार से धो दिया (दूर कर दिया) गया है । (प्रवेश कर) चतुरिका:-- जय हो, स्वामी की जय हो (चित्र में रंग भरने के लिये) कूुचियों की पेटी (वर्तिकाकरण्डक) को लेकर मैं इधर की ओर आ रही थी । राजा:-- फिर क्या हुआ ? चतुरिका:-- यह (कूचियो की पेटी) मेरे हाथ से तरलिका जिनका अनुगमन कर रही थी ऐसी (अर्थात्‌ तरलिका के साथ वहां उपस्थित) महारानी वसुमती के द्वारा "मैं ही महाराज के पास (इसे) पहुंचाऊंगी" - ऐसा कहकर बलपूर्वक ले ली गयी । विदूषक:-- भाग्य से तुम छूट गयी हो । चतुरिका:-- जब तक (वृक्ष की) शाखा (डाली) में फंसे महारानी के दुपट्टे को तरलिका छुड़ाने लगी तब तक मेरे द्वारा अपना शरीर बचा लिया गया (अर्थात्‌ मैं अपने को बचा कर भाग आयी) । राजा:-- हे मित्र, महारानी आने वाली हैं और अत्यधिक मान से गर्वित हैं । आप इस चित्र की रक्षा करें। विदूषक:-- यह कहो कि अपने को (अर्थात्‌ मुझे) बचाओ । (चित्रपट को लेकर और उठकर) यदि अन्तःपुर के कूट-जाल से मुक्त हों तब मुझको "मेघप्रतिच्छन्द" नामक भवन में पुकारना । (तेजी से पैर बढ़ाता हुआ निकल जाता है) सानुमती:-- अन्य (शकुन्तला में) संलग्र हृदय वाला यह (राजा) इस समय (वसुमती के प्रति) शिथिल (स्वल्प) प्रेम युक्त (होने पर भी) (उसके साथ हुये) प्रथम प्रणय का ध्यान रखता है ? (हाथ में पत्र ली हुई प्रवेश कर) प्रतीहारी:-- जय हो, महाराज की जय हो । राजा:-- वेत्रवती, तुम्हारे द्वारा (मार्ग) के बीच में महारानी (तो) नहीं देखी गयी हैं (अर्थात्‌ तुमने महारानी वसुमती को तो नहीं देखा है) । परतीहारी:-- ओर क्या (अर्थात्‌ हाँ देखा था) ! मुझे हाथ में पत्र लिये हुये देखकर लौट गयीं । राजा:-- कार्यों को जानने वाली (महारानी वसुमती) मेरे कार्यों में विघ्न नहीं डालती हैं । प्रतीहारी:-- महाराज ! मन्त्री निवेदन कर रहे हैं कि (कर रूप में प्राप्त) धन-राशि की गणना (गिनने) की अधिकता के कारण नगर-वासियों नागरिको का (केवल) एक ही कार्य देखा गया है । पत्र पर चढ़ाए गये (अङ्कित) उस (कार्य) को महाराज (आप) देख लें । राजा:-- इधर (मुझको) पत्र दिखाओ । (प्रतिहारी पास ले जाती है) राजा:-- (पढ़कर) (यह) क्या ! समुद्र के द्वारा व्यापार करने वाला, व्यापारियों का प्रधान (सार्थवाह) धनमित्र नौका-दुर्घटना में मर गया । ओर वह बेचारा निःसन्तान था । "उसकी धनराशि राजा के पास जानी चाहिये" यह मंत्री के द्वारा लिखा गया है । सन्तानहीनता निश्चय ही कष्टदायक है । वेत्रवती, अत्यधिक धन होने के कारण उस आदरणीय (व्यापारी) को बहुत पत्नियों वाला होना चाहिये । पता लगाया जाए - शायद उसकी पत्नियों मे कोई गर्भिणी हो । प्रतीहारी:-- महाराज, सुना जा रहा है कि अयोध्या के सेठ की पुत्री जिसका पुंसवन संस्कार अभी हुआ है, इसकी पत्नी है । राजा:-- तो गर्भ में स्थित सन्तान पिता के धन का अधिकारी है । जाओ । मंत्री से इस प्रकार कह दो । प्रतीहारी:-- महाराज जो आज्ञा देते हैं । (चल देती है) राजा:-- जरा इधर आओ । प्रतीहारी:-- यह मैं हूँ । राजा:-- इससे क्या कि सन्तान है अथवा नहीं है । प्रजाजन (अपने) जिस-जिस स्नेही सम्बन्धी बन्धु से (मृत्यु के कारण) वियुक्त हो जाते हैं, पापकर्म के अतिरिक्त (यह) दुष्यन्त (अर्थात्‌ मैं) उनका वह-वह (सम्बन्धी) है, ऐसी घोषणा कर दी जाए।
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