मुख्य पृष्ठ शास्त्र परिचय ऐप इंस्टॉल करें
अभिज्ञानशाकुन्तलम् • अध्याय 6 • श्लोक 27
राजा- (सरोषम्‌) कथं मामेवोदिशति ? तिष्ठ कुणपाशन, त्वमिदानीं न भविष्यसि । (शार्द्मारोप्य) वेत्रवति, सोपानमार्गमादेशय । प्रतीहारी--इत इतो देवः । (सर्वे सत्वरमुपसर्पन्ति) राजा- (समन्ताद्‌ विलोक्य) शुन्यं खल्विदम्‌ । (नेपथ्ये) अविहा अविहा । अहमत्र भवन्तं पश्यामि ! त्वं मां न पश्यसि ? बिडालगृहीतो मूषक इव निराशोऽस्मि जीविते संवृत्तः । राजा-- भोस्तिरस्करिणीगर्वित, मदीयमखरं त्वां द्रक्ष्यति । एष तमिषुं सन्दधे- यो हनिष्यति वध्यं त्वां रक्ष्यं रक्षिष्यति द्विजम्‌ । हंसो हि ` क्षीरमादत्ते तन्मिश्रा वर्जयत्यपः ।।
राजा:-- (क्रोधपूर्वक) क्या मुझे ही लक्षित कर कह रहा है ? ठहर शव (मांस) भक्षी (राक्षस), तुम अब नहीं रहोगे । (धनुष चढ़ाकर) वेत्रवती सीढ़ी का मार्ग बताओ । प्रतीहारी:-- महाराज, इधर से, इधर से (आईये) । (सभी लोग शीघ्रता से पास में आ जाते हैं) राजा:-- (चारों ओर देखकर) यह (स्थान) तो शून्य है (अर्थात्‌ यहाँ तो कोई नहीं है) । (नेपथ्य में) बचाओ, बचाओ । मैं आदरणीय आप को देख रहा हूँ । क्या आप मुझको नहीं देख रहे हैं ? बिल्ली के द्वारा पकड़े गये चूहे की भाँति मैं (अपने) जीवन के प्रति निराश हो गया हूँ । राजा:-- हे अदृश्य होने की (तिरस्करिणी) विद्या से गर्वयुक्त, मेरा अस्त्र तुमको देखेगा । तो यह मैं उसी बाण को चढ़ाता हूँ । जो मारने (वध करने) के योग्य तुमको मार डालेगा और रक्षा करने के योग्य ब्राह्मण (विदूषक) को बचा लेगा । जैसे कि हंस दूध को ले लेता है और उसमे मिले हुये जल को छोड देता है । (बाण चढ़ाता है) ।
पूरा ग्रंथ पढ़ें
अभिज्ञानशाकुन्तलम् के सभी अध्याय और श्लोकों को उनके अर्थ और व्याख्या सहित पढ़ने के लिए Krishjan ऐप इंस्टॉल करें। ऐप में आपको संरचित अध्याय, आसान नेविगेशन और ऑफलाइन पढ़ने की सुविधा मिलती है।

सभी अध्याय उपलब्ध

अभिज्ञानशाकुन्तलम् के 18 अध्याय और सभी श्लोक एक ही स्थान पर।

सरल अर्थ

प्रत्येक श्लोक के साथ स्पष्ट हिंदी अनुवाद।

ऑफलाइन पढ़ें

इंटरनेट के बिना भी ग्रंथ पढ़ें।
Krishjan
धर्म का अन्वेषण
ऐप इंस्टॉल करें