राजा:--
(क्रोधपूर्वक) क्या मुझे ही लक्षित कर कह रहा है ? ठहर शव (मांस) भक्षी (राक्षस), तुम अब नहीं रहोगे । (धनुष चढ़ाकर) वेत्रवती सीढ़ी का मार्ग बताओ ।
प्रतीहारी:--
महाराज, इधर से, इधर से (आईये) ।
(सभी लोग शीघ्रता से पास में आ जाते हैं)
राजा:--
(चारों ओर देखकर) यह (स्थान) तो शून्य है (अर्थात् यहाँ तो कोई नहीं है) ।
(नेपथ्य में) बचाओ, बचाओ । मैं आदरणीय आप को देख रहा हूँ । क्या आप मुझको नहीं देख रहे हैं ? बिल्ली के द्वारा पकड़े गये चूहे की भाँति मैं (अपने) जीवन के प्रति निराश हो गया हूँ ।
राजा:--
हे अदृश्य होने की (तिरस्करिणी) विद्या से गर्वयुक्त, मेरा अस्त्र तुमको देखेगा । तो यह मैं उसी बाण को चढ़ाता हूँ । जो मारने (वध करने) के योग्य तुमको मार डालेगा और रक्षा करने के योग्य ब्राह्मण (विदूषक) को बचा लेगा । जैसे कि हंस दूध को ले लेता है और उसमे मिले हुये जल को छोड देता है । (बाण चढ़ाता है) ।
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