कोतवाल:--
हाँ, तब (फिर क्या हुआ) ?
पुरुष:--
एक दिन रोहू (रोहित) मछली मेरे द्वारा टुकड़े-टुकड़े की गयी (अर्थात् मैंने उसे काटा) । उसके पेट के भीतर रत्न से चमकती हुई इस अंगूठी को देखा बाद में मैं उसको बेचने के लिये (व्यापारी को) दिखाता हआ आदरणीय आप लोगों द्वारा पकड़ लिया गया हूँ । अब मुझे मारिये अथवा छोड़िए । यही इस (अंगूठी) के मिलने की कहानी है ।
कोतवाल:--
जानुक, कच्चे मांस की गन्ध वाला यह निःसन्देह ही गोह भक्षी मछली पकड़ने वाला (मल्लाह) है । इसका अंगूठी पाना (अर्थात् इसके अंगूठी पाने की कहानी) विचारणीय है । हम लोग राजदरबार (राजकुल) में ही चलते हैं ।
दोनों सिपाही:--
ठीक है । अरे गिरहकट (गांड काटनेवाले, चोर) चलो ।
(सभी घूमते हैं)
कोतवाल:--
सूचक, नगर के द्वार पर अप्रमादपूर्वक (अर्थात् सावधानी से) (तुम दोनो) इस (धीवर) की देखभाल करना, जब तक यह अंगूठी जिस प्रकार मिली है (वैसा) स्वामी से निवेदन कर और फिर (उनकी) आज्ञा को लेकर (बाहर) निकलता हूँ ।
दोनों (सिपाही):--
महाराज की कृपा प्राप्त करने के लिये श्रीमान् (भीतर) प्रवेश करें ।
( श्याल (कोतवाल) निकल जाता है )
प्रथम (सिपाही):--
जानुक, श्रीमान् (कोतवाल) जी विलम्ब कर रहे हैं ।
दूसरा (सिपाही):--
राजा लोग यथावसर मिलने योग्य होते हैं (अर्थात् राजा लोगों से अवसर देखकर ही मिला जाता है) ।
प्रथम सिपाही:--
जानुक, मेरे हाथ इसके बध के लिये पुष्पों की माला पहनाने हेतु फड़क रहे हैं । (पुरुष की ओर सङ्केत करता है) ।
[प्राचीन काल में जिसको प्राणदण्ड दिया जाता था, उसे न्यायालय से फांसी के स्थान तक लाल माला पहना कर ले जाया जाता था।]
पुरुष:--
आप लोगों के लिये अकारण (ही) (मुझे) मारने का विचार करना उचित नहीं है ।
द्वितीय सिपाही:--
(देखकर) ये हमारे स्वामी हाथ में पत्र लिये हुये राजा के आदेश को लेकर इधर मुख किये हुये दिखायी पड़ रहे हैं । (अब) तु गिद्ध का भोजन (बलि) होगा अथवा कुत्तों का मुंह देखेगा ।
(प्रवेश कर) कोतवाल:--
सूचक, जाल से (मछली पकड़कर) आजीविका चलाने वाला यह (मल्लाह) छोड़ दिया जाए । इसकी अँगूठी मिलने की (प्राप्ति की) बात ठीक है ।
सूचक:--
जैसा श्रीमान् कहते हैं (वैसा ही करता हूँ) ।
द्वितीय (सिपाही):--
यह यमराज के घर जाकर लोट आया । (पुरुष को बन्धन से मुक्त कर देता है) ।
पुरुष:--
(कोतवाल को प्रणाम कर) स्वामी, मेरी आजीविका कैसी है ?
कोतवाल:--
महाराज के द्वारा अँगूठी के मूल्य के बराबर यह पुरस्कार (प्रसाद) भी दिलाया गया है । (पुरुष को धन देता है) ।
पुरुष:--
(प्रणामपूर्वक लेकर) स्वामी, मैं अनुगरहीत हूँ ।
सुचक:--
यह अनुग्रह ही है कि शूली से उतार कर हाथी के कन्धे पर बैठा दिया गया ।
जानुक:--
श्रीमान् , पुरस्कार (देना यह) ज्ञापित करता है कि अँगूठी से महाराज का अत्यधिक प्रम होना चाहिये (अर्थात् पुरस्कार देने से यह प्रतीत होता है कि महाराज को वह अँगूठी अत्यन्त प्रिय है) ।
कोतवाल:--
मैं अनुमान करता हूँ कि उस (अँगूठी) में (जड़ा गया) बहुमूल्य रत्न महाराज को प्रिय नहीं है । (किन्तु) उसको देखने से महाराज का (कोई) प्रिय व्यक्ति (उनको) याद आ गया । (क्योकि) वे स्वभावतः गम्भीर होते हुये भी थोड़ी देर के लिये अश्रुपूरितनयन वाले (आँसू से युक्त नेत्र वाले) हो गये (अर्थात् उनकी आंखो में आंसू भर गये) ।
सुचक:--
तब श्रीमान् (आप) के द्वारा महाराज की सेवा कर दी गयी ।
जानुक:--
यह कहो कि इस धीवरराज (मल्लाहों के स्वामी) के लिये (आप द्वारा महाराज की सेवा की गयी) । (पुरुष को ईष्यापूर्वक देखता है) ।
पुरुष:--
स्वामी, इसमें से आधा आप लोगों के (पूजा के लिये) पुष्पों का मूल्य हो (अर्थात् इसमे से आधा आप लोग ले लें) ।
जानुक:--
इतना ठीक है ।
कोतवाल:--
धीवर, अब तुम मेरे अत्यन्त प्रिय मित्र हो गये । हम लोगों की प्रथम मित्रता मदिरा को साक्षी बनाकर होनी चाहिये । तो हम लोग शराब-विक्रेता की दूकान पर ही चलते हैं ।
(सभी निकल जाते हैं)
॥ प्रवेशक समाप्त ॥
( तत्पश्चात् विमान से सानुमती नामक अप्सरा प्रवेश करती है )
सानुमती:--
जब तक सज्जन लोगों के स्नान का समय है तब तक अप्सरातीर्थ पर बारीबारी से वहाँ उपस्थित रहने का जो नियम है, वह मैंने पूरा कर लिया है । अब इस राजर्षि (दुष्यन्त) का वृत्तान्त (समाचार) को मैं (स्वयं) प्रत्यक्ष करूंगी (अर्थात् प्रत्यक्ष रूप से देखूंगी) । मेनका के साथ सम्बन्ध होने के कारण शकुन्तला मेरे शरीर के समान है । उस (मेनका) के द्वारा (अपनी) पुत्री (शकुन्तला) के लिये (कुछ करने हेतु) मैं पहले से ही कह दी गयी हूँ । (चारो ओर देखकर) क्या कारण है कि (वसन्त) ऋतु के उत्सव के अवसर पर भी राजकुल में उत्सव का प्रारम्भ नहीं दिखायी पड़ रहा है । मुझे ध्यान-शक्ति (प्रणिधान) से सब कुछ जान लेने की शक्ति है किन्तु (अपनी) सखी (मेनका) के अनुरोध का सम्मान मुझे करना ही चाहिये । अच्छा, मैं अन्तर्धान होने की विद्या (तिरस्करिणी) के द्वारा अदृश्य होकर इन दोनों उद्यानपालिकाओं के समीप में रहकर (दुष्यन्त का समाचार) जान जाऊंगी । (अभिनयपूर्वक उतरकर खड़ी हो जाती है) ।
(तत्पश्चात् अम्रमञ्जरी को देखती हुई दासी और उसके पीछे दूसरी दासी प्रवेश करती है)
पहली:--
कुछ लाल-हरे और श्वेत वर्ण वाले, वसन्त (चैत्र) मास के वास्तविक जीवन भूत हे आम के बौर, तुम देख लिये गये हो (अर्थात् तुम मुझे आज दिखायी दिये हो) । हे (वसन्त) ऋतु के मङ्गलस्वरूप, मैं तुमको प्रसन्न (प्रणाम) कर रही हूँ ।
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