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अभिज्ञानशाकुन्तलम् • अध्याय 6 • श्लोक 3
द्वितीया-- परभृतिके, किमेकाकिनी मच्रयसे ? प्रथमा- मधुकरिके, चूतकलिकां दृष्टवोन्मत्ता परभृतिका भवति । द्वितीया- (सहर्षं त्वरयोपगम्य) कथमुपस्थितो मधुमासः ? प्रथमा-मधुकरिके, तवेदानीं काल एष मदविभ्रमगीतानाम्‌ । द्वितीया- सखी, अवलम्बस्व मां यावटग्रपादस्थिता भूत्वा चूतकलिकां गृहीत्वा कामदेवार्चनं करोमि । प्रथमा-- यदि ममापि खल्वर्धमर्चनफलस्य । द्वितीया--अकथितेऽप्येतत्‌ सम्पद्यते । यत एकमेव नौ जीवितं द्विधास्थितं शरीरम्‌ । (सखीमवलम्ब्य स्थिता चूताङ्कुरं गृह्णाति) । अये, अप्रतिबुद्धोऽपि चूतप्रसवोऽत्र बन्धनभङ्गसुरभिर्भवति । त्वमसि मया चूताङ्कुर दत्तः कामाय ` गृहीतधनुषे । पथिकजनयुवतिलक्ष्यः पञ्चाभ्यधिकः शरो भव ।।
दूसरी:-- परिभृतिका, तुम अकेली क्या मंत्रणा कर रही हो ( अर्थात्‌ क्या गुनगुना रही हो ) ? पहली:-- मधुकरिका, परभृतिका (कोयल) आम की कली को देखकर मतवाली हो जाती है । ( मैं परभृतिका भी मतवाली हो रही हूँ ) । दूसरी:-- (प्रसन्नतापूर्वक शीघ्रता से समीप जाकर) क्या वसन्त का महीना आ गया ? पहली:-- मधुकरिका, अब तुम्हारे मदभरे (मादक) विलासों (विभ्रम) और गीतों का यह (सुहावना) समय (आ गया) है । दूसरी:-- सखी, मुझे सहारा दो, जब तक मैं अगले पैर पर खडी होकर आप्रमञ्जरी को लेकर (तोड़कर) कामदेव की अर्चना करती हूँ । पहली:-- यदि मुझे भी पूजा के फल का आधा भाग मिले, तो मैं एसा करूंगी । दूसरी:-- (तुम्हारे) न कहने पर भी यह होता (अर्थात्‌ बिना कहे भी पूजा का आधा फल तुम्हें मिल जाता) । क्योकि हम दोनों के प्राण एक ही हैं, (केवल) शरीर दो हैं । (सखी का सहारा लेकर-खड़ी हुयी आम का बौर तोडती है) । ओह, अविकसित (बिना खिली हुयी) भी आम की मञ्जरी, उण्ठल (बन्धन) के टूटने पर सुगन्ध युक्त हो रही है (अर्थात्‌ सुगन्ध फैला रही है) । (दोनों हाथों को कपोताकार जोड़कर) हे आम्रमञ्जरी ! तुमको मैं धनुर्धारी कामदेव को समर्पित करती हूँ । तुम पथिकजनों (प्रवासियों) की पत्नियों को लक्ष्य बनाने वाले और (कामदेव के) पाचों (बाणो) में सर्वश्रेष्ठ बाण होवो । (आम्रमञ्जरी को फैंकती हैं) ।
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