दूसरी:--
परिभृतिका, तुम अकेली क्या मंत्रणा कर रही हो ( अर्थात् क्या गुनगुना रही हो ) ?
पहली:--
मधुकरिका, परभृतिका (कोयल) आम की कली को देखकर मतवाली हो जाती है । ( मैं परभृतिका भी मतवाली हो रही हूँ ) ।
दूसरी:--
(प्रसन्नतापूर्वक शीघ्रता से समीप जाकर) क्या वसन्त का महीना आ गया ?
पहली:--
मधुकरिका, अब तुम्हारे मदभरे (मादक) विलासों (विभ्रम) और गीतों का यह (सुहावना) समय (आ गया) है ।
दूसरी:--
सखी, मुझे सहारा दो, जब तक मैं अगले पैर पर खडी होकर आप्रमञ्जरी को लेकर (तोड़कर) कामदेव की अर्चना करती हूँ ।
पहली:--
यदि मुझे भी पूजा के फल का आधा भाग मिले, तो मैं एसा करूंगी ।
दूसरी:--
(तुम्हारे) न कहने पर भी यह होता (अर्थात् बिना कहे भी पूजा का आधा फल तुम्हें मिल जाता) । क्योकि हम दोनों के प्राण एक ही हैं, (केवल) शरीर दो हैं । (सखी का सहारा लेकर-खड़ी हुयी आम का बौर तोडती है) । ओह, अविकसित (बिना खिली हुयी) भी आम की मञ्जरी, उण्ठल (बन्धन) के टूटने पर सुगन्ध युक्त हो रही है (अर्थात् सुगन्ध फैला रही है) । (दोनों हाथों को कपोताकार जोड़कर) हे आम्रमञ्जरी ! तुमको मैं धनुर्धारी कामदेव को समर्पित करती हूँ । तुम पथिकजनों (प्रवासियों) की पत्नियों को लक्ष्य बनाने वाले और (कामदेव के) पाचों (बाणो) में सर्वश्रेष्ठ बाण होवो । (आम्रमञ्जरी को फैंकती हैं) ।
पूरा ग्रंथ पढ़ें
अभिज्ञानशाकुन्तलम् के सभी अध्याय और श्लोकों को उनके अर्थ और व्याख्या सहित पढ़ने के लिए Krishjan ऐप इंस्टॉल करें। ऐप में आपको संरचित अध्याय, आसान नेविगेशन और ऑफलाइन पढ़ने की सुविधा मिलती है।
सभी अध्याय उपलब्ध
अभिज्ञानशाकुन्तलम् के 18 अध्याय और सभी श्लोक एक ही स्थान पर।