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अभिज्ञानशाकुन्तलम् • अध्याय 6 • श्लोक 5
उभे- नास्ति सन्देहः । महाप्रभावो राजर्षिः । प्रथमा- आर्य, कति दिवखान्यावयोर्मित्रावसुना राष्टियेण भद्िनीपादमूल प्रेषितयोः । इत्थं च नौ प्रमदवनस्य पालनकर्म समर्पितम्‌ । यदागन्तुकतयाऽश्रुतपूर्वं आवाभ्यामेष वृत्तान्तः । कञ्चुकी-- भवतु । न पुनरेवं प्रवर्तितव्यम्‌ । उभे- आर्य, कौतुहलं नौ । यद्यनेन जनेन श्रोतव्यं कथयत्वार्यः किंनिमित्तं भत्र वसन्तोत्सवः प्रतिषिद्धः । सानुमती--उत्सवप्रियाः खलु मनुष्याः । गुरुणा कारणेन भवितव्यम्‌ । कञ्चुकी- बहुली भूतमेतत्‌ कि न कथ्यते । किमत्रभवत्योः कर्णपथं नायातं शकुन्तलाप्रत्यादेशकौलीनम्‌ । उभे-- श्रुतं राष्टियमुखाद्‌ यावदङ्गलीयक दर्शनम्‌ । कञ्चुकी- तेन ह्यल्पं कथयितव्यम्‌ । यदैव खलु स्वाङ्गलीयकदरनादनुस्मृतं देवेन सत्यमुढपूर्वा मे तत्रभवती रहसि शकुन्तला मोहात्‌ प्रत्यादिष्टेति । तदाप्रभृत्येव पश्चात्तापमुपगतो देवः । तथाहि-- रम्यं देष्टि यथा पुरा प्रकृतिभिर्न प्रत्यहं सेव्यते शय्याप्रान्तविवतनिर्तिगमयत्युन्निद्र एव क्षपाः । दाक्षिण्येन ददाति वाचमुचितामन्तःपुरेभ्यो यदा गोत्रेषु स्खलितस्तदा भवति च त्रीडाविलक्षश्चिरम्‌ ।।
दोनों:-- (इसमे कोई) संदेह नहीं है । राजर्षि (दुष्यन्त) अत्यन्त प्रभावशाली हैं । पहली:-- आर्य, कुछ दिनों पहले राजा के साले (राष्ट्रीय) मित्रावसु के द्वारा हम दोनों महारानी के चरणों में (महारानी की सेवा में) भेज दी गयी थीं । इस प्रकार हम दोनों को (इस) उद्यान (प्रमदवन) की सुरक्षा का काम सोंपा गया है । इसलिये (यहां) नवागन्तुक होने के कारण हम दोनों ने पहले यह समाचार नहीं सुना है । कञ्चुकी- ठीक है, तुम दोनों फिर ऐसा काम मत करना । दोनों:-- आर्य, हम दोनों को जिज्ञासा (है) । यदि इस जन (अर्थात्‌ हम दोनों) द्वारा सुनने योग्य (हो, तो) आर्य बताएं कि किस कारण से स्वामी ने वसन्तोत्सव रोक दिया है ? सानुमती:-- मनुष्य उत्सव के प्रेमी होते हैं । (इसलिये वसन्तोत्सव को रोकने मे कोई बड़ा कारण होना चाहये । कञ्चुकी:-- यह बात सर्वत्र फैल चुकी है तो क्यों न बता दूं | क्या शकुन्तला के परित्याग (अस्वीकार करने) के कारण होने वाला लोकापवाद आप लोगों के कर्णद्वार तक नहीं पहुंचा है (अर्थात्‌ आप लोगों ने नहीं सुना है) । दोनों:-- हम लोगों ने (नगर-रक्षाधिकारी) राजा के साले के मुख से अँगूठी देखने तक की बात सुनी है । कञ्चुकी:-- तब तो थोड़ा ही कहना (शेष) है । जब से अपनी अँगूठी को देखने से महाराज को यह बात याद आयी कि सचमुच सुश्री शकुन्तला एकान्त में मेरे द्वारा पहले विवाहित है (पर) अज्ञान के कारण उसका परित्याग कर दिया है तब से ही महाराज पश्चाताप में पड़े हुए हैं । क्योकि (वे राजा दुष्यन्त सम्प्रति) मनोहर वस्तुओं से द्वेष (घृणा) करते हैं (अर्थात्‌ रमणीय वस्तुओं को देखना पसन्द नहीं करते हैं) । पहले की भाँति प्रजाओं द्वारा प्रतिदिन सेवित नहीं होते (अर्थात्‌ प्रजाजनों मन्त्रियों आदि से पहले की भाँति नही मिलते) । जागते हुये ही बिस्तर के किनारो पर करवट बदलते-बदलते रातों को बिताते हैं । जब शिष्टता के कारण अन्तःपुर (रनिवास) की रानियों को उचित उत्तर देते हैं तब नाम लेने में भूल हो जाने पर (अर्थात्‌ उस रानी के नाम के स्थान पर शकुन्तला का नाम लेने पर) बहुत देर तक लज्जा वश व्याकुल हो जाते हैं ।
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