राजा:--
और निष्ठुर (कठोर) हृदय वाले मरे द्वारा मोहवश (अज्ञानवश) वह कार्य पूरा नहीं किया गया ।
सानुमती:--
(यह) रमणीय अवधि विधाता (अथवा भाग्य) के द्वारा बिगाड़ दी गयी ।
विदूषक:--
कैसे (यह अँगूठी) धीवर (मल्लाह) द्वारा काटी गयी रोहू (रोहित) मछली के पेट के भीतर (पहुंच गयी) थी ?
राजा:--
शची तीर्थ की वन्दना करती हुई तुम्हारी सखी (शकुन्तला) के हाथ से गंगा की धारा में गिर गयी थी ।
विदूषक:--
ठीक है । (यह सम्भव है) ।
सानुमती:--
यही कारण है कि अधर्म से डरने वाले इस राजर्षि को बेचारी (भोलीभाली) शकुन्तला के साथ विवाह के विषय में संदेह हो गया था। अथवा इस प्रकार का प्रेम (अनुराग) (भी) अभिज्ञान (निशानी) की अपेक्षा रखता है - यह कैसी बात है ।
राजा:--
तो इस अँगूठी को उलाहना दूंगा ।
विदूषक:--
(अपने मन में) इस (राजा दुष्यन्त) के द्वारा (अब) पागलों का मार्ग पकड़ लिया गया है ।
राजा:--
(अँगूठी को देखकर) हे अँगूठी, सुन्दर और कोमल उंगलियों वाले उस हाथ को छोडकर तुम कैसे जल में डूब गयी (गिर गयी) ? अथवा अचेतन (वस्तु) गुणों को नहीं देख सकती । (किन्तु चेतन होते हुये भी) मेरे द्वारा ही क्यों प्रिय (शकुन्तला) अपमानित की गयी ( अर्थात् मैने ही प्रिय का अपमान क्यों किया ) ?
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