प्रतीहारी:--
इसी प्रकार घोषणा करानी चाहिये । (निकलकर, पुनः प्रवेश कर) समय से हुई वर्षा की भाँति महाराज के आदेश का (प्रजा द्वारा) अभिनन्दन किया गया ।
राजा:--
(लम्बी और गर्म साँस लेकर) ओह, सन्तान के अभाव के कारण निराश्रित कुलों की सम्पत्तियां मूलपुरुष (वंश के प्रतिनिधि) के मर जाने पर दूसरे के पास चली जाती हैं । मेरे भी मर जाने पर पुरुवंश की लक्ष्मी की यही दशा होगी ।
प्रतीहारी:--
अमङ्गल नष्ट (हो) ।
राजा:--
आये हुये (शकुन्तला रूपी) कल्याण की अवहेलना (तिरस्कार) करने वाले मुझको धिक्कार है ।
सानुमती:--
निःसन्देह (मेरी) सखी (शकुन्तला) को ही हृदय में रखकर इनके (राजा के) द्वारा अपनी निन्दा की गयी है ।
राजा:--
(उचित) समय पर जिसमें बीज बोया गया है ऐसी और महान् फल को प्रदान करने में समर्थ पृथ्वी की भाँति, वंश की प्रतिष्ठास्वरूप धर्मपत्नी (शकुन्तला) का, (उसके गर्भ में पुत्र के रूप में) अपने-आप को संरोपित (स्थापित) कर देने पर भी, मेरे द्वारा परित्याग कर दिया गया।
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