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अभिज्ञानशाकुन्तलम् • अध्याय 6 • श्लोक 23
प्रतीहारी-एवं नाम घोषयितव्यम्‌ । (निष्क्रम्य । पुनः प्रविश्य) काले प्रवृष्टमिवाभिनन्दितं देवस्य शासनम्‌ । राजा- (दीर्घमुष्णं च निःशधस्य) एवं भोः, सन्ततिच्छेदनिरवबलम्बानां कुलानां मूलपुरुषावसाने सम्पदः परमुपतिष्ठन्ते । ममाप्यन्ते पुरुवंशश्रिय एष एव वृत्तान्तः । प्रतीहारी- प्रतिहतममङ्गलम्‌ । राजा--धिङ्मामुपस्थितश्रेयोऽ वमानिनम्‌ । सानुमती--असंशयं सखीमेव हृदये कृत्वा निन्दितोऽनेनात्मा । राजा-संरोपितेऽप्यात्मनि धर्मपत्नी त्यक्ता मया नाम॒ कुलप्रतिष्ठा । कल्पिष्यमाणा महते फलाय वसुन्धरा काल इवोत्पबीजा ।।
प्रतीहारी:-- इसी प्रकार घोषणा करानी चाहिये । (निकलकर, पुनः प्रवेश कर) समय से हुई वर्षा की भाँति महाराज के आदेश का (प्रजा द्वारा) अभिनन्दन किया गया । राजा:-- (लम्बी और गर्म साँस लेकर) ओह, सन्तान के अभाव के कारण निराश्रित कुलों की सम्पत्तियां मूलपुरुष (वंश के प्रतिनिधि) के मर जाने पर दूसरे के पास चली जाती हैं । मेरे भी मर जाने पर पुरुवंश की लक्ष्मी की यही दशा होगी । प्रतीहारी:-- अमङ्गल नष्ट (हो) । राजा:-- आये हुये (शकुन्तला रूपी) कल्याण की अवहेलना (तिरस्कार) करने वाले मुझको धिक्कार है । सानुमती:-- निःसन्देह (मेरी) सखी (शकुन्तला) को ही हृदय में रखकर इनके (राजा के) द्वारा अपनी निन्दा की गयी है । राजा:-- (उचित) समय पर जिसमें बीज बोया गया है ऐसी और महान्‌ फल को प्रदान करने में समर्थ पृथ्वी की भाँति, वंश की प्रतिष्ठास्वरूप धर्मपत्नी (शकुन्तला) का, (उसके गर्भ में पुत्र के रूप में) अपने-आप को संरोपित (स्थापित) कर देने पर भी, मेरे द्वारा परित्याग कर दिया गया।
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