राजा:--
(शीघ्रता से अस्त्र को उतारता हुआ) अरे मातलि (आप हैं) । इन्द्र के सारथी (आप का) स्वागत है ।
(प्रवेश करके) विदूषक:--
जिसके द्वारा मैं यज्ञीय पशु की मार मारा गया हूँ । वह इन (राजा) के द्वारा स्वागतपूर्वक अभिनन्दित (सत्कृत) किया जा रहा है ।
मातलि:--
(मुस्कराकर) चिरंजीविन् , सुनिये जिसके लिये मैं इन्द्र के द्वारा आप के पास भेजा गया हूँ ।
राजा:--
मैं (सुनने के लिये) सावधान हूँ ।
मातलि:--
कालनेमि की सन्तान दुर्जय नामक राक्षसों का समूह है ।
राजा:--
है । मेरे द्वारा पहले ही नारद से सुना गया था।
मातलि--
वह (राक्षस-दल) निश्चय ही आपके मित्र इन्द्र के लिये अजेय हैं । आप युद्ध-भूमि में उस (रक्षस-दल) को मारने वाले (हन्ता) माने गये हैं । सूर्य रात्रि के जिस अन्धकार को नष्ट करने में समर्थ नहीं होता, उस (अन्धकार) को चन्द्रमा दूर कर देता है ।
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