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अभिज्ञानशाकुन्तलम् • अध्याय 6 • श्लोक 29
राजा-(ससम्भरममल्नमुपसंहरन्‌) अये, मातलिः स्वागतं महेन्द्रसारथे ! (प्रविश्य) विदूषकः--अहं येनेष्टिपशुमारं मारितः, सोऽनेन स्वागतेनाभिनन्द्यते । मातलिः- (सस्मितम्‌) आयुष्मन्‌ , श्रूयतां यदर्थमस्मि हरिणा भवत्सकाशं प्रेषितः । राजा- अवहितोऽस्मि । मातलिः- अस्ति कालनेमिप्रसूतिदुर्जयो नाम दानवगणः । राजा--अस्ति । श्रुतपूर्व मया नारदात्‌ । मातलिःसख्युस्ते स किल शतक्रतोरजय्यस्तस्य त्वं रणशिरसि स्मृतो निहन्ता । उच्छेत्तुं प्रभवति यन्न॒ सप्तसप्िस्तत्नैशं तिमिरमपाकरोति चनद्धः ।।
राजा:-- (शीघ्रता से अस्त्र को उतारता हुआ) अरे मातलि (आप हैं) । इन्द्र के सारथी (आप का) स्वागत है । (प्रवेश करके) विदूषक:-- जिसके द्वारा मैं यज्ञीय पशु की मार मारा गया हूँ । वह इन (राजा) के द्वारा स्वागतपूर्वक अभिनन्दित (सत्कृत) किया जा रहा है । मातलि:-- (मुस्कराकर) चिरंजीविन्‌ , सुनिये जिसके लिये मैं इन्द्र के द्वारा आप के पास भेजा गया हूँ । राजा:-- मैं (सुनने के लिये) सावधान हूँ । मातलि:-- कालनेमि की सन्तान दुर्जय नामक राक्षसों का समूह है । राजा:-- है । मेरे द्वारा पहले ही नारद से सुना गया था। मातलि-- वह (राक्षस-दल) निश्चय ही आपके मित्र इन्द्र के लिये अजेय हैं । आप युद्ध-भूमि में उस (रक्षस-दल) को मारने वाले (हन्ता) माने गये हैं । सूर्य रात्रि के जिस अन्धकार को नष्ट करने में समर्थ नहीं होता, उस (अन्धकार) को चन्द्रमा दूर कर देता है ।
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