वह आप शस्त्र धारण किये हुये ही अब इन्द्र के (इस) रथ पर चढ़कर विजय के लिये प्रस्थान करें ।
राजा:--
मैं इन्द्र के इस सम्मान से अनुगृहीत हूँ । अच्छा, आप के द्वारा माधव्य के प्रति ऐसा (व्यवहार) क्यों किया गया ?
मातलि:--
उसे भी कह रहा हूँ । मैने किसी कारण से चिरंजीवी आपको मानसिक सन्ताप के कारण व्याकुल देखा । (इसके) बाद चिरंजीवी आप को कुपित करने के लिये मेने (माधव्य के साथ) वैसा (व्यवहार) किया है । क्योकि अग्नि इन्धन के चलाने (हिलाने-डुलाने) से प्रज्वलित हो जाता है । सर्प छेड़ने पर फण (फन) को फैलाता है । इसी प्रकार व्यक्ति प्रायः उत्तेजना के कारण (ही) अपने प्रभाव (पराक्रम) को धारण करता (प्रकट करता) है ।
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