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अभिज्ञानशाकुन्तलम् • अध्याय 6 • श्लोक 30
स भवानात्तशख्र एव. इृदानीवैन््ररथमारुष्य विजयाय प्रतिष्ठताम्‌ । राजा- अनुगृहीतोऽहमनया मघवतः सम्भावनया । अथ माधव्यं प्रति भवता किमेवं प्रयुक्तम्‌ ? मातलिः- तदपि कथ्यते । किञ्चिन्निमित्तादपि मनः सन्तापात्‌ युष्मान्‌ मया विक्लवो दृष्टः । पश्चात्‌ कोपयितुमायुष्मन्तं तथाकृतवानस्मि कुतः-- ज्वलति चलितेन्धनोऽग्निर्विप्रकृतः पन्नगः फणा कुरुते । प्रायः स्वं महिमानं क्षोभात्‌ प्रतिपद्यते हि जनः ।।
वह आप शस्त्र धारण किये हुये ही अब इन्द्र के (इस) रथ पर चढ़कर विजय के लिये प्रस्थान करें । राजा:-- मैं इन्द्र के इस सम्मान से अनुगृहीत हूँ । अच्छा, आप के द्वारा माधव्य के प्रति ऐसा (व्यवहार) क्यों किया गया ? मातलि:-- उसे भी कह रहा हूँ । मैने किसी कारण से चिरंजीवी आपको मानसिक सन्ताप के कारण व्याकुल देखा । (इसके) बाद चिरंजीवी आप को कुपित करने के लिये मेने (माधव्य के साथ) वैसा (व्यवहार) किया है । क्योकि अग्नि इन्धन के चलाने (हिलाने-डुलाने) से प्रज्वलित हो जाता है । सर्प छेड़ने पर फण (फन) को फैलाता है । इसी प्रकार व्यक्ति प्रायः उत्तेजना के कारण (ही) अपने प्रभाव (पराक्रम) को धारण करता (प्रकट करता) है ।
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