(तत्पश्चात् नगर-रक्षाधिकारी राजा का साला और उसके पीछे बंधे हुए पुरुष को लेकर दो रक्षक (सिपाही) प्रवेश करते हैं ।)
दोनों सिपाही:--
(पीट कर) अरे चोर, बताओ मणिजट्टित और जिस पर नाम खुदा हुञा है ऐसी यह राजा की अँगूठी तुमने कहाँ पायी ?
पुरुष:--
(भय के अभिनय के साथ) आदरणीय आप लोग (मुझपर) प्रसन्न हों । मैं इस प्रकार का काम (अर्थात् चोरी) करने वाला नहीं हूँ ।
प्रथम (सिपाही):--
क्या सुयोग्य ब्राह्मण (हो) - ऐसा समझकर राजा ने (तुम्हे यह) दान दिया है ?
पुरुष:--
अब सुनिये । मैं शक्रावतार (नामक तीर्थ) में रहने वाला मल्लाह हूँ ।
द्वितीय (सिपाही):--
अरे चोर, क्या हम लोगों ने तुम्हारी जाति पूछी है ?
कोतवाल:--
सूचक, इसे क्रमशः सारी बात कहने दो । इसको बीच में मत टोको ।
दोनों (सिपाही):--
जो श्रीमान् (आवुत्त) आज्ञा देते हैं । (तदनुसार अपनी बात) कहो ।
पुरुष:--
मैं जाल-कंटा (कांटा-उदगाल) इत्यादि मछली पकड़ने के साधनों (उपायो) से (अपने) परिवार का पालन पोषण करता हूँ ।
कोतवाल (हंसकर):--
तो (यह तुम्हारी बड़ी) पवित्र आजीविका है ।
पुरुष:--
निन्दित (भी) जो काम स्वाभाविक हो (अर्थात् वंशपरम्परा से चला आ रहा हो), उसको निश्चय ही नहीं छोडना चाहिये । (यज्ञों में) पशु हत्या जैसे कर्म के कारण कठोर (हृदय वाला) वेदपाठी (ब्राह्मण) वस्तुतः कृपा (दया) भाव से कोमल (ही होता है, अर्थात् कहा जाता है) ।
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