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अभिज्ञानशाकुन्तलम् • अध्याय 6 • श्लोक 1
(ततः प्रविशति नागरिकः श्यालः पश्चाद्‌ बद्धपुरुषमादाय रक्षिणौ च) रक्षिणौ- (ताडयित्वा) अरे कुम्भीरक, कथय कुत्र त्वयैतन्मणिबन्धनोत्कीर्णनामधेयं राजकौोयमङ्गुलीयकं समासादितम्‌ ? पुरूषः-( भीतिनाटितकेन) प्रसीदन्तु भावमिश्राः, अहं नेदृशकर्मकारी । प्रथमः- किं शोभनो ब्राह्मण इति कलयित्वा राज्ञा प्रतिग्रहो दत्तः ? पुरुषः-- शृणुतेदानीम्‌ । अहं शक्रावताराभ्यन्तरालवासी धीवरः । द्वितीयः-- पाटच्चर, किमस्माभिजतिः पृष्टा ? श्यालः- सूचक, कथयतु सर्वमनुक्रमेण । मैनमन्तरा प्रतिबधान । उभो- यदावुत्त आज्ञापयति । कथय । पुरुषः- अहं जालोद्गालादिभिर्मत्स्यबन्धनोपायैः कुटुम्बभरणं करोमि । श्यालः- (विहस्य) विशुद्ध इदानीमाजीवः । पुरुषः- सहजं किल यद्‌ विनिन्दितं न खलु तत्कर्म विवर्जनीयम्‌ । पशुमारणकर्मदारुणोऽनुकम्ामृदुरेव श्रोत्रियः ।।
(तत्पश्चात्‌ नगर-रक्षाधिकारी राजा का साला और उसके पीछे बंधे हुए पुरुष को लेकर दो रक्षक (सिपाही) प्रवेश करते हैं ।) दोनों सिपाही:-- (पीट कर) अरे चोर, बताओ मणिजट्टित और जिस पर नाम खुदा हुञा है ऐसी यह राजा की अँगूठी तुमने कहाँ पायी ? पुरुष:-- (भय के अभिनय के साथ) आदरणीय आप लोग (मुझपर) प्रसन्न हों । मैं इस प्रकार का काम (अर्थात्‌ चोरी) करने वाला नहीं हूँ । प्रथम (सिपाही):-- क्या सुयोग्य ब्राह्मण (हो) - ऐसा समझकर राजा ने (तुम्हे यह) दान दिया है ? पुरुष:-- अब सुनिये । मैं शक्रावतार (नामक तीर्थ) में रहने वाला मल्लाह हूँ । द्वितीय (सिपाही):-- अरे चोर, क्या हम लोगों ने तुम्हारी जाति पूछी है ? कोतवाल:-- सूचक, इसे क्रमशः सारी बात कहने दो । इसको बीच में मत टोको । दोनों (सिपाही):-- जो श्रीमान्‌ (आवुत्त) आज्ञा देते हैं । (तदनुसार अपनी बात) कहो । पुरुष:-- मैं जाल-कंटा (कांटा-उदगाल) इत्यादि मछली पकड़ने के साधनों (उपायो) से (अपने) परिवार का पालन पोषण करता हूँ । कोतवाल (हंसकर):-- तो (यह तुम्हारी बड़ी) पवित्र आजीविका है । पुरुष:-- निन्दित (भी) जो काम स्वाभाविक हो (अर्थात्‌ वंशपरम्परा से चला आ रहा हो), उसको निश्चय ही नहीं छोडना चाहिये । (यज्ञों में) पशु हत्या जैसे कर्म के कारण कठोर (हृदय वाला) वेदपाठी (ब्राह्मण) वस्तुतः कृपा (दया) भाव से कोमल (ही होता है, अर्थात्‌ कहा जाता है) ।
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